ओडिशा के एक सुदूर गांव के रहने वाले 73 वर्षीय बुरसी प्रधान और उनके परिवार की सफलता की कहानी इन दिनों चर्चा में है। दिहाड़ी मजदूरी से लेकर खेती तक का कड़ा संघर्ष करने वाले बुरसी ने यह साबित कर दिया है कि दृढ़ संकल्प से कठिन परिस्थितियों को भी बदला जा सकता है।

कठिन संघर्ष और आजीविका की तलाश
बुरसी प्रधान ने अपने जीवन का अधिकांश समय दिहाड़ी मजदूर के रूप में बिताया। परिवार का पेट पालने के लिए उन्हें केरल तक काम की तलाश में जाना पड़ा, क्योंकि उनके लिए काम न करने का मतलब परिवार का भूखा रहना था। खराब स्वास्थ्य के कारण जब वे वापस अपने गांव लौटे, तब उनकी आजीविका पूरी तरह से कृषि पर निर्भर हो गई।
बच्चों की शानदार शैक्षणिक सफलता
कड़ी मेहनत और अभावों के बीच पले-बढ़े बुरसी के बच्चों ने शिक्षा के क्षेत्र में बड़ी सफलता हासिल की है। उनके बड़े बेटे बिभीषण ने वर्ष 2021 में कोरापुट स्थित श्री लक्ष्मण नायक मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल में प्रवेश लिया। इसके बाद पिछले वर्ष उनकी बेटी मोनालिसा भी उसी मेडिकल कॉलेज में पहुंच गईं।

इस वर्ष बुरसी के एक अन्य बेटे असरिया और बेटी सुनेमी ने क्रमशः भवानीपटना तथा बलांगीर के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस की सीट हासिल की। इसके अलावा, उनके परिवार की एक अन्य सदस्य मिनखी ने भी नीट परीक्षा पास कर पुरी के श्री जगन्नाथ मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल में दाखिला पाया है।
मेहनती पिताओं का मौन समर्पण
विशेषज्ञों का मानना है कि कई पिता अपने बच्चों को खुलकर प्यार या समय नहीं जता पाते, क्योंकि वे परिवार की आर्थिक सुरक्षा और बेहतर भविष्य के इंतजाम में जुटे रहते हैं। बुरसी जैसे तमाम पिता बिना किसी छुट्टी के साल के सातों दिन काम करते हैं ताकि उनके बच्चे एक आसान और सुरक्षित जीवन जी सकें।

