राज्यों में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) का मुद्दा और राजनीतिक चुनौतियां

राज्यों में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) का मुद्दा और राजनीतिक चुनौतियां

भारतीय जनता पार्टी के तीन प्रमुख वैचारिक मुद्दों में से समान नागरिक संहिता (यूसीसी) को सबसे पेचीदा माना जाता है। धार्मिक और सामाजिक रीति-रिवाजों की विविधता के कारण इसे लागू करना चुनौतीपूर्ण रहा है, इसके बावजूद इस विषय पर लगातार चर्चाएं हो रही हैं। गृह मंत्री अमित शाह की इस घोषणा के बाद कि एनडीए शासित राज्य चुनाव से पहले अपने यहां यूसीसी लाएंगे, राजनीतिक हलकों में नई बहस छिड़ गई है।

राज्यों में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) का मुद्दा और राजनीतिक चुनौतियां

एनडीए सहयोगियों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं

इस बार इस प्रस्ताव पर केवल विपक्षी आपत्तियां ही सामने नहीं आई हैं, बल्कि एनडीए के भीतर से भी भिन्न विचार देखने को मिले हैं। कुछ सहयोगी दलों और नेताओं ने इसके क्रियान्वयन को लेकर व्यापक और विस्तृत विचार-विमर्श किए जाने की आवश्यकता पर जोर दिया है। पूर्वोत्तर के राज्यों में गठबंधन के साझीदार पारंपरिक जनजातीय रीति-रिवाजों पर पड़ने वाले असर को लेकर पहले ही विरोध जता चुके हैं। इसके अलावा, अन्य क्षेत्रीय दलों ने भी सभी हितधारकों से गहन चर्चा करने का सुझाव दिया है।

संवैधानिक प्रावधान और राज्यों की भूमिका

संविधान के नीति-निर्देशक सिद्धांतों में शामिल यूसीसी से विवाह, तलाक और उत्तराधिकार जैसे मामले जुड़े हैं। व्यक्तिगत नागरिक मामलों से जुड़े कानून समवर्ती सूची में आते हैं, जिसके कारण राज्यों को अपने नियम बनाने का अधिकार मिलता है। हालांकि, अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग संहिताएं होने से इसके मूल उद्देश्य को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। उत्तराखंड देश का ऐसा पहला राज्य बना था जिसने इससे जुड़ा कानून बनाया, जिसे बाद में अदालतों में भी चुनौती दी गई और आदिवासी समुदायों को इसके दायरे से बाहर रखा गया।

राज्यों में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) का मुद्दा और राजनीतिक चुनौतियां

भविष्य की राजनीतिक दिशा

उत्तराखंड के अलावा गुजरात, मध्य प्रदेश और असम जैसे अन्य भाजपा शासित राज्यों ने भी इसी तरह के कानून पारित किए हैं, हालांकि उन्हें अभी राष्ट्रपति की मंजूरी का इंतजार है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन तमाम जटिलताओं और अड़चनों के बीच इस तरह की रणनीतिक घोषणाओं का असर आगामी चुनावी माहौल और राजनीतिक समीकरणों पर पड़ सकता है। विपक्षी दल फिलहाल इस विषय पर संभलकर प्रतिक्रिया दे रहे हैं ताकि किसी भी प्रकार की ध्रुवीकरण वाली बहस से बचा जा सके।

Anju Kunwar

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