मतदाता सूची और फॉर्म-6 में बदलाव को लेकर चुनाव आयोग में क्यों मचा है घमासान

मतदाता सूची और फॉर्म-6 में बदलाव को लेकर चुनाव आयोग में क्यों मचा है घमासान

भारत का निर्वाचन आयोग इन दिनों एक बड़े आंतरिक और राजनीतिक संकट के दौर से गुजर रहा है, जहां मुख्य चुनाव आयुक्त से लेकर आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। मतदाता सूचियों में सुधार और उन्हें अपडेट करने की प्रक्रिया के बाद सामने आई ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने के बाद विवाद और गहरा गया है। विपक्षी दलों द्वारा लगाए जा रहे आरोपों और आयोग के भीतर सामने आई असहमतियों ने इस पूरे मामले को सुर्खियों में ला दिया है।

मतदाता सूची और फॉर्म-6 में बदलाव को लेकर चुनाव आयोग में क्यों मचा है घमासान

क्या है स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन और फॉर्म-6 का विवाद

देश की मतदाता सूचियों में सुधार के लिए शुरू की गई ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ यानी एसआईआर प्रक्रिया के तहत जब पहली ड्राफ्ट सूची सामने आई, तो देश भर से करोड़ों नाम हटाए जा चुके थे। इसके बाद से ही विपक्षी दलों ने आरोप लगाना शुरू कर दिया कि सोची-समझी साजिश के तहत मतदाताओं के नाम काटे गए हैं। इस विवाद के केंद्र में नया फॉर्म-6 है, जिसके माध्यम से नए मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज कराते हैं। इस बार फॉर्म में एक नया अनिवार्य सवाल जोड़ा गया है, जिसमें आवेदक को यह बताना होता है कि क्या उनके माता-पिता या दादा-दादी पिछली एसआईआर वोटर लिस्ट में मौजूद थे।

आयोग के भीतर आंतरिक मतभेद और आपत्तियां

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, चुनाव आयोग के भीतर भी सब कुछ सामान्य नहीं है। आयोग के दो अन्य सदस्यों ने पिछले महीनों में एसआईआर प्रक्रिया से जुड़े कई फैसलों और आदेशों पर आधिकारिक आपत्तियां दर्ज कराई थीं। इन आयुक्तों का कहना था कि आयोग के कई बड़े फैसले उनकी लिखित सलाह या सहमति के बिना लिए गए हैं। हालांकि, चुनाव आयोग ने इन आंतरिक असहमतियों को खारिज करते हुए इसे एक बहु-सदस्यीय संस्था में प्रशासनिक चर्चा का सामान्य हिस्सा बताया है और स्पष्ट किया है कि अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए हैं।

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स्थानीय अधिकारियों की पहुंच और सॉफ्टवेयर से जुड़े मुद्दे

इस पूरे घटनाक्रम में स्थानीय स्तर के चुनावी अधिकारियों की भूमिका और नए सॉफ्टवेयर ईसीआईनेट की पहुंच को लेकर भी कई सवाल उठाए गए हैं। आलोचकों और असंतुष्ट अधिकारियों का तर्क है कि राज्यों के कई अधिकारियों को नए सॉफ्टवेयर पर पूरा एक्सेस नहीं दिया गया, जिससे तकनीकी परेशानियां पैदा हुईं। इसके अलावा, कुछ राज्यों में तकनीकी खामियों और दस्तावेजों के बावजूद मतदाताओं के नाम सूची में नहीं जुड़ पाने के मामले भी सामने आए हैं, जिन्हें लेकर न्यायपालिका और ट्रिब्यूनल के स्तर पर भी प्रक्रियाएं चल रही हैं।

Anju Kunwar

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