देश के विभिन्न किसान संगठनों ने केंद्र सरकार द्वारा तय किए गए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर नाराजगी जाहिर की है। किसानों का कहना है कि एमएसपी में की गई मामूली बढ़ोतरी खेती की बढ़ती लागत से मेल नहीं खाती है।

खेती की लागत और महंगाई के आंकड़े सार्वजनिक करने की मांग
किसान प्रतिनिधियों ने मांग की है कि सरकार को उन तमाम लागत और महंगाई के आंकड़ों को सार्वजनिक करना चाहिए, जिन्हें फसलों के लिए एमएसपी तय करते समय आधार बनाया गया था। भारतीय किसान यूनियन (अराजनीतिक) के राष्ट्रीय प्रवक्ता धर्मेंद्र मलिक ने आरोप लगाया कि पश्चिम एशिया में तनाव के चलते किसानों को खरपतवारनाशक, कीटनाशक, डीजल और अन्य पोषक तत्वों के दाम काफी अधिक चुकाने पड़ रहे हैं, जबकि गेहूं के एमएसपी में नाममात्र की वृद्धि की गई है।
किसान नेताओं का तर्क है कि कृषि क्षेत्र में घटते मुनाफे की वजह से किसानों पर कर्ज का बोझ लगातार बढ़ रहा है। उन्होंने मांग की है कि पंजाब कृषि विश्वविद्यालय और पंतनगर जैसे संस्थानों द्वारा निकाले गए गेहूं के उत्पादन लागत आंकड़ों को भी जनता के सामने लाया जाना चाहिए।
व्यापक लागत और मुनाफे पर चिंता
संयुक्त किसान मोर्चा समन्वय समिति के सदस्य पी. कृष्ण प्रसाद ने कहा कि आयोग प्रमुख उत्पादक राज्यों में व्यापक अवसर लागत को ध्यान में रखते हुए निजी तौर पर सी2 लागत का मूल्यांकन करता है। किसान संगठन स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के अनुसार सी2 लागत पर 50 प्रतिशत लाभ मार्जिन की गारंटी की मांग लंबे समय से करते आ रहे हैं।
किसान नेताओं का मानना है कि यदि खेती से मिलने वाला रिटर्न इसी तरह घटता रहा, तो किसानों की आर्थिक स्थिति और अधिक बिगड़ सकती है। कृषि लागत और मूल्य आयोग (CACP) की रिपोर्ट सार्वजनिक न किए जाने को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं, जिससे किसानों में रोष व्याप्त है।

