मेरठ के नीला ड्रम हत्याकांड के बाद चर्चा में महिलाओं को मौत की सजा का कानूनी प्रावधान और आंकड़े

मेरठ के नीला ड्रम हत्याकांड के बाद चर्चा में महिलाओं को मौत की सजा का कानूनी प्रावधान और आंकड़े

मेरठ के चर्चित नीला ड्रम हत्याकांड में अदालत द्वारा आरोपियों को मौत की सजा सुनाए जाने के बाद भारत में महिलाओं को मिलने वाले मृत्युदंड का मुद्दा एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गया है। भारतीय न्याय प्रणाली में मृत्युदंड को सबसे गंभीर और कठोर सजा माना जाता है, जिसे अत्यंत दुर्लभ मामलों में ही तय किया जाता है। ऐसे में महिलाओं को फांसी की सजा मिलना और भी दुर्लभ मामलों में शुमार होता है।

मेरठ के नीला ड्रम हत्याकांड के बाद चर्चा में महिलाओं को मौत की सजा का कानूनी प्रावधान और आंकड़े

देश की जेलों में डेथ-रो पर मौजूद महिलाओं की स्थिति

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, देश भर की विभिन्न जेलों में काफी संख्या में कैदी मौत की सजा का इंतजार कर रहे हैं। इनमें कई महिलाएं भी शामिल हैं जिनकी सजा पर उच्च न्यायालयों या उच्चतम न्यायालय में सुनवाई जारी है अथवा जिनकी दया याचिकाएं लंबित पड़ी हैं। इनमें से कई मामले ऐसे हैं जिनमें दोषियों को निचली अदालत से सजा मिलने के बाद एक दशक से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन कानूनी प्रक्रियाओं के कारण अंतिम अमल नहीं हो सका है।

कानूनी प्रक्रिया और सजा पर अमल में देरी की वजह

भारतीय कानून के तहत किसी भी ट्रायल कोर्ट द्वारा मौत की सजा सुनाए जाने के बाद मामला वहीं समाप्त नहीं हो जाता है। नियमों के मुताबिक इस तरह की सजा के लिए उच्च न्यायालय से पुष्टि होना अनिवार्य होता है। इसके अतिरिक्त दोषियों के पास उच्चतम न्यायालय में अपील, पुनर्विचार याचिका, क्यूरेटिव याचिका और राष्ट्रपति या राज्यपाल के समक्ष दया याचिका दाखिल करने जैसे तमाम संवैधानिक और कानूनी विकल्प मौजूद रहते हैं। इन्ही लंबी कानूनी प्रक्रियाओं और औपचारिकताओं के चलते निचली अदालत के फैसले और वास्तविक सजा के क्रियान्वयन के बीच कई वर्षों का लंबा अंतर आ जाता है।

स्वतंत्र भारत में महिला को फांसी का ऐतिहासिक मामला

आजाद भारत के न्यायिक इतिहास में अब तक बहुत ही कम ऐसा मौका आया है जब किसी महिला को वास्तव में फांसी पर लटकाया गया हो। आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार वर्ष 1955 में एक महिला को जहर देकर तीन लड़कियों की हत्या करने के जुर्म में मृत्युदंड दिया गया था, जिसकी सभी कानूनी अपीलें और दया याचिकाएं खारिज होने के बाद सजा पर अमल किया गया था। आज भी न्यायिक रूप से फांसी का सामना करने वाली महिलाओं के मामलों में यह एक विशिष्ट उदाहरण माना जाता है।

Anju Kunwar

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