भारत में हाल ही में समाप्त हुआ मॉनसून सामान्य से कम बारिश के साथ विदा हुआ है, जिससे कृषि क्षेत्र पर दबाव काफी बढ़ गया है। जून से सितंबर के दौरान देश भर में सामान्य से 13 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई है, जिसे पिछले दस वर्षों का सबसे कमजोर मॉनसून माना जा रहा है। इस स्थिति के बाद अब किसानों और कृषि विशेषज्ञों की चिंता आने वाले दिनों और मुख्य रूप से रबी फसलों को लेकर बढ़ गई है।

कमजोर मॉनसून और असमान बारिश का प्रभाव
रिपोर्टों के अनुसार, इस साल मॉनसून के दौरान बारिश का वितरण काफी असमान रहा है। देश के कई हिस्सों में कुल बारिश में भारी कमी दर्ज की गई, जबकि कुछ चुनिंदा क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा और बादल फटने जैसी चरम घटनाएं भी देखने को मिलीं। पूर्वी, पूर्वोत्तर और दक्षिणी प्रायद्वीप के कई राज्यों में सामान्य से काफी कम बारिश हुई है, जिससे मिट्टी में नमी का स्तर और भूजल का पुनर्भरण दोनों प्रभावित हुए हैं। इसके अलावा, जलाशयों में भी जल भंडारण पिछले साल की तुलना में कम दर्ज किया गया है, जिसका असर दक्षिणी और अन्य क्षेत्रों पर अधिक दिख रहा है।
अल नीनो और सर्दियों में गर्मी का बढ़ता खतरा
मॉनसून की विदाई के बाद अब प्रशांत महासागर में अल नीनो के विकसित होने की संभावना ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि इसके प्रभाव से आगामी सर्दियों के दौरान तापमान सामान्य से अधिक रह सकता है और बारिश में कमी आ सकती है। जलवायु परिवर्तन और वैश्विक तापवृद्धि इस स्थिति को और अधिक तीव्र कर रहे हैं, जिससे फरवरी के महीने से ही गर्मी समय से पहले दस्तक दे सकती है।
रबी फसलों और कृषि उत्पादन पर असर
कम बारिश, घटता जल स्तर और मिट्टी में नमी की कमी का सीधा असर कृषि गतिविधियों पर पड़ रहा है। खरीफ सीजन में धान और कुछ अन्य फसलों के रकबे में पहले ही गिरावट देखी जा चुकी है। अब रबी की फसलों जैसे गेहूं, चना और सरसों की बुवाई तथा उनकी वृद्धि पर भी इन मौसमी बदलावों का जोखिम मंडरा रहा है। जानकारों का सुझाव है कि किसानों को पानी की अधिक मांग वाली फसलों के बजाय कम अवधि की फसलों और मोटे अनाजों के विविधीकरण पर विचार करना चाहिए ताकि इस संकट से कुछ हद तक निपटा जा सके।

