कांग्रेस पार्टी द्वारा आगामी 1 नवंबर को रामलीला मैदान में एक बड़ी राजनीतिक रैली का आयोजित करने की तैयारी है। ‘वोट बचाओ, देश बचाओ’ के नारे के साथ होने वाले इस कार्यक्रम के जरिए ‘इंडिया’ गठबंधन का लक्ष्य दस लाख लोगों को जुटाने का है। लोकसभा में विपक्ष के नेता इस मंच के माध्यम से चुनाव आयोग की भूमिका और हालिया चुनावी परिणामों को लेकर अपनी बात रखना चाहते हैं। बंगाल, महाराष्ट्र, असम, हरियाणा और दिल्ली के चुनावों में कथित वोट चोरी को लेकर आयोग की भूमिका पर सवाल उठाए जा रहे हैं। हालांकि इन आरोपों के दायरे से तेलंगाना, कर्नाटक, तमिलनाडु, हिमाचल, पंजाब और केरल के चुनावों को बाहर रखा जाता है।

चुनावी माहौल और अभियान की धार
कांग्रेस को ऐसा महसूस हो रहा है कि चुनाव आयोग के खिलाफ चलाए जा रहे उनके अभियान की धार हाल के दिनों में कुछ कमजोर पड़ी है। इस महारैली का मुख्य उद्देश्य उस अभियान में फिर से जान फूंकना है। उत्तर प्रदेश में फरवरी-मार्च 2027 में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। इसके अलावा 2027 में ही पंजाब, गुजरात, मणिपुर, उत्तराखंड, हिमाचल और गोवा में भी चुनाव तय हैं। विपक्ष का यह मानना है कि 1 नवंबर की यह महारैली मतदाताओं के मन में वोट चोरी को लेकर संदेह पैदा करने में मदद करेगी, जिससे वे एनडीए को वोट देने से पहले विचार करने पर मजबूर होंगे।
व्यापारिक संगठनों की चिंता और त्योहारों का समय
दिवाली और धनतेरस के मुख्य त्योहारी सीजन के ठीक बीच में इस प्रकार के आयोजन को लेकर व्यापारी वर्ग में भारी चिंता देखी जा रही है। दिल्ली के व्यापारिक संगठन चैंबर ऑफ ट्रेड एंड इंडस्ट्री (सीटीआई) ने राहुल गांधी को पत्र लिखकर अनुरोध किया है कि इस रैली को दिवाली के बाद तक टाल दिया जाए। उनके औपचारिक पत्र में बताया गया है कि इस रैली के कारण यातायात गंभीर रूप से बाधित हो सकता है और धनतेरस तथा दिवाली के महत्वपूर्ण खरीदारी सीजन में खुदरा बाजारों को बंद करना पड़ सकता है। इससे लगभग दस हजार करोड़ तक का बड़ा वित्तीय नुकसान खुदरा बाजारों को झेलना पड़ सकता है।

पत्र में यह भी स्पष्ट किया गया है कि रामलीला मैदान के पांच किलोमीटर के दायरे में चांदनी चौक, सदर बाजार, चावड़ी बाजार, खारी बावली, करोल बाग और लाजपत राय जैसे करीब 20 बड़े बाजार स्थित हैं। ऐसे में ‘इंडिया’ गठबंधन की यह रैली न केवल व्यापारी समुदाय को नाराज कर सकती है, बल्कि त्योहार के समय घरों में रहने को मजबूर होने वाले दिल्लीवासियों को भी उससे दूर कर सकती है। आलोचकों का मानना है कि सीटीआई के सुझाव के अनुसार यदि इस रैली को दिवाली के बाद 10 नवंबर को भी आयोजित किया जाता, तो जनता की परेशानियों से बचा जा सकता था। हालांकि, 10 नवंबर को सोनिया गांधी के संस्मरणों की किताब रिलीज होने का कार्यक्रम भी तय माना जा रहा है, जिसके कारण शायद तारीख में बदलाव करना संभव नहीं हो पाया।
अदालती टिप्पणियां और राजनीतिक जल्दबाजी
शायद इस राजनीतिक जल्दबाजी के पीछे कांग्रेस की यह चिंता भी जुड़ी हुई है कि वोट चोरी के मुद्दे पर जनभावनाओं का रुख बदल रहा है। सौरव दास और आशुतोष रांका के खिलाफ हाल में आए अदालती फैसलों के साथ-साथ नेहा बोरा पर अदालत की टिप्पणियों ने भी जनमानस के रुख में आ रहे बदलाव को रेखांकित किया है। इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट में एसआईआर प्रक्रिया के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुनवाई चल रही है। शीर्ष अदालत में सुनवाई के दौरान की गई टिप्पणियों से भी कांग्रेस नेताओं की चिंताएं बढ़ी हुई हैं, क्योंकि उन्हें आशंका है कि अदालत का फैसला उनके अनुकूल नहीं आ सकता। यही कारण है कि विपक्ष के लिए रामलीला मैदान की यह रैली चुनाव आयोग के खिलाफ जनमत तैयार करने का एक त्वरित जरिया बन गई है, भले ही इसके आयोजन का समय त्योहारी सीजन के लिहाज से उचित नहीं माना जा रहा है।

