सुप्रीम कोर्ट ने संसद और राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जातियों (एससी) तथा अनुसूचित जनजातियों (एसटी) के लिए आरक्षित सीटों के अनिवार्य चक्रानुक्रम (रोटेशन) की मांग करने वाली याचिका को खारिज कर दिया है। शीर्ष अदालत ने इस मामले में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए कहा कि यह न्यायिक समीक्षा का विषय नहीं है, बल्कि इस पर निर्णय लेना विधायिका का काम है। अदालत ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले को बरकरार रखा है।

मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई वाली पीठ ने सुनवाई के दौरान टिप्पणी करते हुए याचिकाकर्ता को सुझाव दिया कि इस कानून में बदलाव के लिए आम सहमति बनाने हेतु उन्हें चुने हुए प्रतिनिधियों से संपर्क करना चाहिए। पीठ ने स्पष्ट किया कि अदालत संविधान को दोबारा नहीं लिख सकती और न ही आरक्षण के संबंध में अपनी तरफ से चक्रानुक्रम का नियम जोड़ सकती है। इस तरह के प्रावधानों की समीक्षा करना या नया कानून बनाना पूरी तरह से विधायी निकायों के अधिकार क्षेत्र में आता है।
डिलिमिटेशन एक्ट, 2002 की वैधता बरकरार
सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने परिसीमन अधिनियम, 2002 की धारा 9(1)(c) की वैधता को सही ठहराया। इस कानूनी प्रावधान के अनुसार, आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों की पहचान उन क्षेत्रों में की जाती है जहां एससी और एसटी आबादी का अनुपात अपेक्षाकृत अधिक होता है, और इसमें ऐसी सीटों के नियमित रोटेशन का कोई प्रावधान नहीं है। अदालत ने कहा कि परिसीमन एक बार की जाने वाली विधायी प्रक्रिया है, जो निरंतर नहीं चलती।
अदालत ने क्या कहा?
पीठ ने सुनवाई के दौरान यह भी रेखांकित किया कि बिना किसी विधायी और वैधानिक ढांचे के अधिकारियों या परिसीमन आयोग को आरक्षित सीटों को घुमाने या बदलने का निर्देश नहीं दिया जा सकता। इसके अलावा, अदालत ने मतदान के अधिकार और किसी विशेष निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ने के अधिकार के बीच अंतर को भी स्पष्ट किया, और कहा कि सामान्य श्रेणी के उम्मीदवार बिना आरक्षित सीटों के अन्य स्थानों से चुनाव लड़ने के लिए स्वतंत्र हैं। याचिकाकर्ता ने उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले के कदीपुर विधानसभा क्षेत्र का हवाला दिया था, जो लंबे समय से आरक्षित है, लेकिन अदालत ने याचिका पर कोई भी हस्तक्षेप करने से मना कर दिया।

