दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र में उपेक्षित उष्णकटिबंधीय बीमारियों (NTDs) से निपटने के मामलों में भारत ने उल्लेखनीय योगदान दिया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की एक मध्य-अवधि मूल्यांकन रिपोर्ट के अनुसार, 2021 से 2025 के दौरान भारत ने तीन ऐसी बीमारियों को सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या के रूप में समाप्त कर दिया है। इसके बावजूद, क्षेत्र में डेंगू और कोढ़ के बढ़ते मामलों के साथ-साथ अपर्याप्त वित्तपोषण 2030 तक के लक्ष्यों के सामने बड़ी चुनौती पेश कर रहे हैं।

भारत की प्रमुख उपलब्धियां और क्षेत्रीय प्रगति
डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट बताती है कि दिसंबर 2025 तक इस क्षेत्र के आठ देशों ने कम से कम एक उपेक्षित बीमारी का उन्मूलन कर लिया था। इसमें भारत तीन बीमारियों के खात्मा के साथ क्षेत्रीय स्तर पर सबसे आगे रहा। भारत ने 2024 में ट्रेकोमा को सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या के रूप में पूरी तरह खत्म कर दिया। इसके अलावा, देश ने 2023 तक सभी स्थानिक ब्लॉकों में विसरल लीशमानियासिस यानी काला-अजार के उन्मूलन लक्ष्य को भी हासिल कर लिया।
सामूहिक दवा प्रशासन (MDA), स्कूली स्तर पर डीवॉर्मिंग कार्यक्रमों और मजबूत निगरानी प्रणाली के संयुक्त प्रयासों से उन लोगों की संख्या में भारी कमी आई है जिन्हें इन बीमारियों के खिलाफ हस्तक्षेप की आवश्यकता थी। क्षेत्र में ऐसे लोगों की संख्या 2011 के 1.02 अरब से घटकर 2024 में 647 मिलियन रह गई है। हालांकि, 2030 तक वैश्विक लक्ष्य को पाने के लिए इस संख्या को और अधिक घटाकर लगभग 102 मिलियन पर लाना होगा।

लिम्फैटिक फाइलेरियासिस और अन्य चुनौतियां
व्यापक प्रगति के बावजूद लिम्फैटिक फाइलेरियासिस अभी भी भारत, म्यांमार और नेपाल के लिए एक बड़ी उन्मूलन चुनौती बना हुआ है। इसके अलावा, मूल्यांकन रिपोर्ट ने डेंगू और कोढ़ के मामलों में हुई तेज वृद्धि पर विशेष चिंता व्यक्त की है।
- क्षेत्र में रिपोर्ट किए गए डेंगू के मामले 2020 के 150,412 से बढ़कर 2024 में 541,419 हो गए।
- कोढ़ (Leprosy) के मामले 2020 में 74,514 से बढ़कर 2024 में 109,597 तक पहुंच गए।
- बच्चों में इसके मामलों का उच्च अनुपात और देरी से निदान होना लगातार संक्रमण के प्रसार को दर्शाता है।
भविष्य के लिए 2030 के लक्ष्य
डब्ल्यूएचओ ने 2026 से 2030 की अवधि के लिए भारत, म्यांमार और नेपाल में लिम्फैटिक फाइलेरियासिस के उन्मूलन में तेजी लाने तथा डेंगू, कोढ़, रेबीज और स्नेकबाइट एनवेनोमिंग के खिलाफ interventions को मजबूत करने का आह्वान किया है। संगठन ने चेतावनी दी है कि बीमारी खत्म होने के बाद राजनीतिक ध्यान और बाहरी फंडिंग में कमी आने से पहले की गई मेहनत प्रभावित हो सकती है, इसलिए घरेलू स्वास्थ्य बजट और राजनीतिक प्रतिबद्धता को बनाए रखना बेहद जरूरी है।

