नीति आयोग के पूर्व सीईओ और भारत के पूर्व जी-20 शेरपा अमिताभ कांत ने देश की अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए दो मुख्य बातों पर जोर दिया है। उनका मानना है कि विदेशी मुद्रा की स्थिति संभालने के लिए अपनाई जाने वाली अल्पकालिक योजनाएं केवल अस्थायी राहत देती हैं, जबकि वास्तविक समाधान निर्यात को बढ़ावा देना और अधिक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) आकर्षित करना है।

प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और विनियामक स्पष्टता
वियतनाम और मैक्सिको जैसे देशों ने हाल के वर्षों में भारी मात्रा में विदेशी निवेश आकर्षित किया है। भारत में भी निवेशकों का भरोसा बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के स्तर पर नियमों में स्पष्टता हो। आईडीबीआई बैंक में हिस्सेदारी बेचने की मंजूरी को वित्तीय क्षेत्र में एक बड़ा कदम माना गया है, जिससे बाजार का विश्वास मजबूत हुआ है। हालांकि, कुछ न्यायिक फैसलों और नियामक अनिश्चितताओं के कारण निवेशकों में असमंजस की स्थिति भी पैदा होती है, जिसे दूर करने की आवश्यकता है।
विवादों और मुकदमों का असर
देश में विभिन्न कर विवादों में बड़ी मात्रा में पूंजी फंसी हुई है। केंद्र और राज्य सरकारों के साथ-साथ सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम भी कई मामलों में मुकदमेबाजी में शामिल रहते हैं। इस तरह की अनिश्चितता निवेशकों के लिए जोखिम बढ़ा देती है और वे भारत में निवेश का मूल्यांकन करते समय अधिक सावधानी बरतते हैं। निवेशकों का भरोसा बहाल करने के लिए इन अड़चनों को सुलझाना जरूरी है।

मैन्युफैक्चरिंग और निर्यात को बढ़ावा
देश में इलेक्ट्रॉनिक्स और डेटा सेंटर जैसे क्षेत्रों में नई कंपनियों को मैन्युफैक्चरिंग के लिए आकर्षित करने की अपार संभावनाएं हैं। जिस प्रकार स्मार्टफोन आज देश की शीर्ष निर्यात श्रेणी बन चुके हैं, उसी प्रकार अन्य क्षेत्रों में भी आत्मनिर्भरता हासिल करने की जरूरत है ताकि आयात पर निर्भरता कम हो सके और वैश्विक बाजार में देश की स्थिति मजबूत हो।

