गन्ने और चावल के बाद अब एथनॉल उत्पादन के लिए मक्का का उपयोग तेजी से बढ़ने लगा है, जिससे आम उपभोक्ताओं की चिंताएं बढ़ गई हैं। एक खाद्य वस्तु पर दबाव कम करने के लिए किए जा रहे इन बदलावों का सीधा असर अब दूसरे कृषि उत्पादों और रोजमर्रा की उपभोक्ता वस्तुओं पर पड़ सकता है। तेल कंपनियों द्वारा तय किए गए भारी-भरकम एथनॉल लक्ष्यों को पूरा करने के लिए कच्चे माल के विकल्पों में लगातार फेरबदल करना पड़ रहा है।

गन्ने और चावल पर लगी सीमाएं
देश में चीनी की घरेलू उपलब्धता को सुरक्षित रखने के लिए सरकार ने गन्ने के प्रमुख स्रोतों जैसे रस, सिरप और बी-हेवी शीरे से बनने वाले एथनॉल की खरीद पर रोक लगा दी है। अब केवल सी-हेवी शीरे से ही एथनॉल बनाने की अनुमति दी गई है। इसी तरह, चावल के उपयोग की सीमा भी तय कर दी गई है ताकि इसकी उपलब्धता प्रभावित न हो। एफसीआई के अतिरिक्त चावल और टूटे चावल से एक तय मात्रा में ही एथनॉल का उत्पादन किया जा सकता है। इन सीमाओं के चलते अब एथनॉल उद्योग की पूरी निगाहें मक्का और अन्य वैकल्पिक अनाजों पर टिकी हैं।
मक्का की बढ़ती मांग और कीमतें
कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, एथनॉल निर्माण में मक्का की खपत आगामी वर्ष में काफी बढ़ने की संभावना है, जिसके लिए लाखों टन अतिरिक्त मक्का की आवश्यकता होगी। हालांकि, कमजोर मानसून के कारण इतनी मात्रा में मक्का की उपलब्धता को लेकर संशय बना हुआ है। मंडियों में मक्का के दाम पहले ही न्यूनतम समर्थन मूल्य से ऊपर चल रहे हैं। मांग और आपूर्ति के इस असंतुलन के कारण कीमतों में तेजी आने की पूरी संभावना है।
पोल्ट्री और डेयरी उद्योग पर असर
मक्का महंगा होने का सबसे पहला और गहरा प्रभाव पोल्ट्री और डेयरी सेक्टर पर पड़ेगा। मुर्गियों के आहार का मुख्य घटक मक्का होता है, इसलिए इसकी लागत बढ़ने से चिकन और अंडों के दाम में उछाल आ सकता है। इसके अलावा, पशुपालन और डेयरी सेक्टर में इस्तेमाल होने वाले संतुलित आहार के महंगे होने से दूध उत्पादन की लागत भी बढ़ जाएगी। स्टार्च बनाने वाले उद्योगों के साथ-साथ खाद्य प्रसंस्करण, कागज, कपड़ा और दवा क्षेत्रों पर भी इसकी लागत का दबाव पड़ सकता है।

