तिब्बत में ग्लेशियर ढहने और नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ के बाद वैज्ञानिकों ने पूरे हिमालय क्षेत्र में बड़े खतरे की चेतावनी दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि हिंदुकुश हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियर बहुत तेज़ी से पिघल रहे हैं और लंबे समय से जमी हुई जमीन यानी पर्माफ्रोस्ट अस्थिर हो रही है, जिससे इस विशाल भूभाग पर गंभीर आपदाओं का संकट मंडरा रहा है।

बढ़ता तापमान और पिघलते ग्लेशियर
शोध रिपोर्टों के अनुसार, हिंदुकुश हिमालय क्षेत्र में लगभग 40,000 ग्लेशियर मौजूद हैं, लेकिन इनमें से बेहद कम ग्लेशियरों की नियमित निगरानी हो पा रही है। जलवायु परिवर्तन के कारण इस क्षेत्र में बर्फ पिघलने की गति में भारी वृद्धि दर्ज की गई है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यदि वैश्विक तापमान वृद्धि को नियंत्रित भी कर लिया जाए, तब भी इस सदी के अंत तक इस क्षेत्र के एक-तिहाई ग्लेशियर समाप्त हो सकते हैं। इस स्थिति से भूस्खलन, ग्लेशियल झीलों के फटने और अचानक आने वाली विनाशकारी बाढ़ का जोखिम लगातार बढ़ रहा है।
भारत में संवेदनशील ग्लेशियल झीलें
विशेषज्ञों की हालिया रिपोर्ट बताती है कि भारत में लगभग 200 ग्लेशियल झीलों के किनारों के टूटने का भारी जोखिम बना हुआ है, जिनमें से कई झीलों को अत्यधिक संवेदनशील श्रेणी में रखा गया है। पूर्व में उत्तराखंड और सिक्किम जैसे राज्यों में इस तरह की आपदाएं देखी जा चुकी हैं। दुर्गम भूगोल और अधिक लागत के कारण सभी ग्लेशियरों पर लगातार नज़र रखना कठिन है, इसलिए वैज्ञानिकों का सुझाव है कि उन खास क्षेत्रों या हॉटस्पॉट को प्राथमिकता दी जानी चाहिए जहां नीचे बस्तियां या बड़े बुनियादी ढांचे मौजूद हैं।
आपदा से निपटने के लिए आपसी सहयोग की जरूरत
चूंकि जलवायु परिवर्तन किसी देश की सीमाओं में बंधा नहीं है, इसलिए विभिन्न हिमालयी देशों के बीच आपसी सहयोग, डेटा साझा करने और निगरानी तंत्र को मजबूत करने की सख्त आवश्यकता है। उपग्रहों और आधुनिक तकनीकों की मदद से पहाड़ों की हलचल और संभावित खतरों के संकेत समय रहते प्राप्त किए जा सकते हैं, जिससे भविष्य में बड़े पैमाने पर होने वाले नुकसान से बचा जा सके।

