अमेरिका द्वारा रूस और ईरान पर प्रतिबंध लगाने वाले एक नए कानून को कानूनी रूप दिए जाने के बाद वैश्विक ऊर्जा बाजार में चर्चाएं तेज हो गई हैं। इस नए कानून के तहत रूस से तेल आयात करने वाले या प्रतिबंधों से बचने में मदद करने वाले देशों पर भारी टैरिफ लगाए जाने का प्रावधान है, जिसका असर भारत जैसे प्रमुख आयातक देशों पर भी पड़ सकता है।

भारत सरकार ने इस मामले पर अपनी आधिकारिक प्रतिक्रिया देते हुए स्पष्ट किया है कि देश अपने नागरिकों की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। इसके लिए बाजार की बदलती परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग स्रोतों से ऊर्जा जरूरतें पूरी की जाती रहेंगी। हालांकि, आंकड़े बताते हैं कि पिछले कुछ समय से भारत अपनी कुल तेल आवश्यकताओं का एक बड़ा हिस्सा रूस से आयात करता रहा है।
विगत अनुभवों और अमेरिकी प्रतिबंधों का असर
ऐतिहासिक रूप से देखें तो अमेरिका के कड़े प्रतिबंधों के कारण भारत को पहले भी कई देशों से तेल आयात बंद करना पड़ा था। वर्ष 2019 में वेनेजुएला पर लगे प्रतिबंधों के बाद वहां से होने वाला आयात पूरी तरह समाप्त हो गया था। इसी तरह, ईरान से भी तेल की आपूर्ति पर प्रतिबंधों का गहरा असर पड़ा और आयात शून्य पर पहुंच गया था। यूक्रेन संघर्ष के बाद जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ीं, तब भारत ने रियाद दरों पर मिलने वाले रूसी तेल का रुख किया था।

चीन की तुलना में सीमित विकल्प
विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार की टैरिफ नीतियों से निपटने के मामले में चीन के मुकाबले भारत के पास रणनीतिक विकल्प सीमित हैं। चीन के पास रेयर अर्थ, मैग्नेट और महत्वपूर्ण फार्मास्यूटिकल सामग्री के निर्यात को नियंत्रित करने जैसे मजबूत साधन हैं, जिनका उपयोग वह दबाव बनाने के लिए कर सकता है। वहीं, पिछले एक दशक में विभिन्न मौकों पर ऊर्जा के क्षेत्र में अमेरिकी दबाव का प्रभाव भी देखा गया है, जिसके चलते आने वाले दिनों में स्थिति पर सावधानीपूर्वक नजर रखने की आवश्यकता है।

