जीवन में मानसिक शांति और संतुलन बनाए रखने के लिए इच्छाओं पर नियंत्रण रखना बेहद आवश्यक माना गया है। पंडित विजयशंकर मेहता के अनुसार, हमारे मन में उठने वाली कामनाओं का मूल स्रोत बाहरी दुनिया होती है। जब हम बाहर किसी सुंदर चेहरे या आकर्षक वस्तुओं को देखते हैं, तो वे हमारे भीतर प्रवेश कर जाती हैं और वहीं से इच्छाओं का ताना-बाना बुनना शुरू हो जाता है।

बाहरी दुनिया से आती हैं इच्छाएं
मनुष्य की इच्छाओं का स्वतः आंतरिक रूप से निर्माण नहीं होता है, बल्कि बाहरी साधन और दृश्य जब आंखों के माध्यम से भीतर उतरते हैं, तब कामनाएं बनती हैं। बाहरी तत्वों को देखकर मन उन्हें ग्रहण करता है और फिर उनकी पूर्ति के लिए प्रयास शुरू हो जाते हैं। इन इच्छाओं को दबाने से कई तरह की मानसिक व शारीरिक परेशानियां उत्पन्न हो सकती हैं। इसलिए यह जरूरी है कि बाहरी चीजों को देखकर उनके प्रति एक गहरी समझ विकसित की जाए ताकि वे मन को प्रभावित न कर सकें।
भीतर का खालीपन और सही भराव
यदि मन के भीतर किसी तरह का खालीपन रहता है, तो बाहरी चीजें उसमें बहुत जल्दी जगह बना लेती हैं। इस खालीपन को भरने के लिए सकारात्मक और आध्यात्मिक मार्ग अपनाने की सलाह दी जाती है। जब हृदय में परमात्मा का नाम जप और उनकी सच्ची अनुभूति समाहित होती है, तब बाहरी साधन और वस्तुएं मन को विचलित नहीं कर पातीं। ईश्वर की सच्ची अनुभूति होने पर मन में किसी भी प्रकार की लालसा या कामना का स्थान नहीं बचता है।

समझदारी से करें मन का प्रबंधन
हर सुंदर वस्तु या व्यक्ति को देखकर उसे अपने भीतर बसाने की बजाय यह विचार करना चाहिए कि वह बाहरी दुनिया का हिस्सा है और वहीं रहे तो बेहतर है। अपने अंतःकरण को भौतिक इच्छाओं का केंद्र बनाने से बचाकर यदि उसे उच्च विचारों और ईश्वर की आराधना में लगाया जाए, तो जीवन में वास्तविक शांति का अनुभव किया जा सकता है।

