कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई तकनीक आज के समय में दुनिया भर में एक बड़ा भू-राजनीतिक मुद्दा बन चुकी है। इस तकनीक का नेतृत्व कौन करेगा, इसे लेकर वैश्विक स्तर पर बड़ी बहस छिड़ी हुई है। हालांकि पिछले दो दशकों में भारत ने सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में एक बड़ी पहचान बनाई है, लेकिन इसके बावजूद देश इस नई तकनीकी दौड़ में फिलहाल शामिल नहीं हो सका है।

एआई के क्षेत्र में भारत के पिछड़ने के कारण
इस तकनीक में पिछड़ने का एक बड़ा कारण इसके लिए आवश्यक भारी-भरकम निवेश है, जो कि दसियों से सैकड़ों अरब डॉलर तक हो सकता है। इसके अलावा, नीति निर्माताओं और उद्यमियों की ओर से भविष्य की इस बड़ी क्रांति की कल्पना करने में कुछ कमी भी नजर आई है। देश के नीति निर्माता आईटी क्षेत्र में मिली पुरानी सफलता से संतुष्ट थे और यह अंदाजा नहीं लगा पाए कि यह तकनीक जीवनशैली में कितना गहरा बदलाव लाने जा रही है।
तेजी से बदलती तकनीक और इसके दोहरे प्रभाव
पारंपरिक कंप्यूटर का विकास धीरे-धीरे हुआ था, जबकि एआई बहुत कम समय में अत्यधिक तेजी से आगे बढ़ा है। साल 2022 के अंत में चैटजीपीटी के आने के बाद से इस तकनीक से जुड़ाव चार साल से भी कम पुराना है, लेकिन इसके उपयोगकर्ताओं की संख्या एक अरब से अधिक हो चुकी है। यह तकनीक इंसानों की कार्यक्षमता बढ़ाने के साथ-साथ कई मायनों में उनकी जगह भी ले रही है। शिक्षा, शोध, संगीत और गणित जैसे क्षेत्रों में इसका प्रभाव साफ तौर पर देखा जा सकता है, जहां यह एक कुशल सहायक की भूमिका निभा रहा है।
रोजमर्रा की जिंदगी पर प्रभाव और भविष्य की राह
दूसरी ओर, यह तकनीक आम लोगों की जिंदगी को भी आसान बना रही है। ईमेल्स का जवाब देने, शेड्यूल व्यवस्थित करने, खाना पकाने, घर की देखभाल और यात्राओं का प्रबंधन करने जैसे कामों में यह मददगार साबित हो रही है। हालांकि, इंसानों की जगह लेने की इसकी क्षमता से नौकरीपेशा लोगों और ग्रामीण क्षेत्रों पर पड़ने वाले असर को लेकर चिंताएं भी हैं। ऐसे में सरकारी नीतियां यह तय करने में अहम भूमिका निभाएंगी कि इस तकनीक का दायरा कितना और किस रूप में होना चाहिए।

