भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कोविड महामारी के बाद दुनिया भर में लगातार बढ़ रहे वैश्विक कर्ज के स्तर पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा है कि मौजूदा वित्तीय मजबूती को भविष्य की सुरक्षा नहीं माना जा सकता है, इसलिए वैश्विक समुदाय को सतर्क रहने की आवश्यकता है।

नई दिल्ली में आयोजित कौटिल्य इकोनॉमिक कॉन्क्लेव के दौरान वैश्विक वित्तीय स्थिरता पर अपने विचार रखते हुए आरबीआई गवर्नर ने यह बात कही। उन्होंने पश्चिम एशिया के संघर्ष का जिक्र करते हुए कहा कि हालांकि मौजूदा झटकों को फिलहाल सहन कर लिया गया है, लेकिन इस माहौल ने मुद्रास्फीति के दबाव और व्यवस्था की कमजोरियों को बढ़ा दिया है।
वैश्विक अर्थव्यवस्था के समक्ष पांच प्रमुख जोखिम
गवर्नर मल्होत्रा ने वैश्विक वित्तीय प्रणाली के सामने पांच बड़े जोखिमों को रेखांकित किया है। उनके अनुसार, बढ़ता वैश्विक कर्ज, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) आधारित परिसंपत्ति मूल्यांकन, सामान्य से अधिक लीवरेज यानी अत्यधिक कर्ज, प्राइवेट क्रेडिट और साइबर सुरक्षा से जुड़े खतरे ऐसे बिंदु हैं जिन पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि भले ही ये जोखिम व्यक्तिगत रूप से अभी बहुत बड़ा संकट न लग रहे हों, लेकिन यदि ये एक साथ उभरते हैं तो वैश्विक वित्तीय ढांचे पर अत्यधिक दबाव पड़ सकता है।
कर्ज और अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाला प्रभाव
बढ़ते वैश्विक कर्ज के खतरों को समझाते हुए उन्होंने बताया कि दुनिया भर में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की तुलना में कर्ज का अनुपात बढ़ गया है और सरकारी बॉन्ड पर प्रतिफल भी सख्त हुआ है। इससे सरकारों के लिए उधारी महंगी हो रही है और कंपनियों की कर्ज चुकाने की क्षमता प्रभावित हो रही है।
क्रिप्टोकरेंसी के मामले पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि भारत इस दिशा में अपना सतर्क रुख बनाए हुए है और टोकनाइजेशन जैसी नई तकनीकों को बढ़ावा दिया जा रहा है, लेकिन क्रिप्टो को लेकर केंद्रीय बैंक की चिंताएं अभी भी बनी हुई हैं।

