दिल्ली स्थित प्रसिद्ध सूफी संत हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के 723वें उर्स के मौके पर देश के कई जाने-माने लोगों ने दरगाह पहुंचकर अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की। इस विशेष अवसर पर प्रेम, करुणा और सांप्रदायिक सौहार्द के सूफी मूल्यों को याद किया गया।

दरगाह पर गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति
सुप्रीम कोर्ट के अवकाशप्राप्त न्यायाधीश जस्टिस मार्कंडेय काटजू और वरिष्ठ अधिवक्ता व सांसद कपिल सिब्बल ने 3 अक्टूबर 2026 को दिल्ली की ऐतिहासिक हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया दरगाह का दौरा किया। दरगाह के सज्जादा नशीन और प्रबंध समिति के अध्यक्ष सैयद फरीद अहमद निज़ामी ने आगंतुकों का स्वागत किया। परंपरा के अनुसार, मेहमानों ने हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया और उनके प्रमुख शिष्य अमीर खुसरो की मजारों पर फूल और चादर चढ़ाई।
सूफी परंपरा और मानवीय मूल्य
दरगाह परिसर में आगंतुकों को संत के जीवन से जुड़े विभिन्न पहलुओं और ऐतिहासिक कहानियों से अवगत कराया गया। एक प्रसंग के अनुसार, हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया ने अपने सहयोगियों को निर्देश दिया था कि दरगाह आने वाले किसी भी व्यक्ति से उसका धर्म न पूछा जाए, बल्कि सबसे पहले उसे भोजन और जल दिया जाए तथा उसकी समस्याओं को सुनकर सहायता का प्रयास किया जाए। सूफी संतों की यह परंपरा सभी मनुष्यों के बीच भाईचारे और समान आदर का संदेश देती है।
साझा सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत
सूफी संतों की मजारों या दरगाहों को समाज में विभिन्न समुदायों को जोड़ने वाले साझा स्थलों के रूप में देखा जाता है। उर्स के इस पावन अवसर पर संत की शिक्षाओं को याद करते हुए भारत की विविधता और साझा सांस्कृतिक विरासत के महत्व पर प्रकाश डाला गया। हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के साथ उनके प्रिय शिष्य और महान सांस्कृतिक हस्ती अमीर खुसरो की मज़ार भी पास ही स्थित है, जो भारतीय इतिहास और कला में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है।

