इस बार मानसून बेहद कमजोर रहा है, जिसके कारण देश के कई राज्यों के विभिन्न हिस्सों में फसलें चौपट हो गई हैं। पैदावार पर बुरा असर पड़ा है और कई जगहों पर स्थिति यह हो गई है कि किसानों को खेती के लिए बीज तक नसीब नहीं हो सका है। हालांकि, इस स्थिति को बिहार में आई बाढ़ से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए, क्योंकि वहां की बाढ़ नेपाल से छोड़े गए बेइंतहा पानी का परिणाम है। इस पूरे संकट के पीछे हमारी अपनी कुछ गतिविधियां भी जिम्मेदार हैं, जिन पर विचार करना बेहद आवश्यक हो गया है।

वनों की कटाई और घटती हरियाली
हमने अंधाधुंध तरीके से पेड़ों की कटाई की है। किसानों ने ज्यादा से ज्यादा फसल उगाने की चाह में जंगलों और बीड़ जैसी जगहों को तो खत्म किया ही, साथ ही खेतों की मेड़ों को भी बहुत छोटा कर दिया। इस वजह से चारों तरफ से हरियाली गायब हो गई है। स्थिति यह बन गई है कि बादलों को अपनी ओर आकर्षित करने या बुलाने वाला कोई माध्यम ही नहीं बचा है। जैसे शहर कंक्रीट के बड़े जंगल बन चुके हैं, वैसे ही हमारे गांवों और खेतों ने भी हरियाली का दामन छोड़ दिया है।
पश्चिमी संस्कृति का अंधानुकरण और बच्चों की शिक्षा
हमने अपनी आने वाली पीढ़ी यानी बच्चों को यह कभी नहीं सिखाया कि हमारे देश के संदर्भ में बारिश का असल महत्व क्या है। बच्चों को बारिश का उपयोग और उसकी महत्ता समझाने के लिए हमारे पास आज कुछ भी नहीं बचा है। इसके विपरीत, हम बच्चों को शुरुआती दौर में ऐसी कविताएं सिखा रहे हैं जो बारिश को भगाने का संदेश देती हैं, जैसे कि ‘रेन-रेन गो अवे’। पश्चिमी देशों में बार-बार बारिश होती है, इसलिए उन्होंने अपने यहां वैसी कविताएं रचीं। लेकिन हमारे देश में बच्चे तो बारिश में खेलना-कूदना अच्छी तरह जानते और पसंद करते हैं। फिर भी हम पश्चिमी देशों का अंधानुकरण करते हुए बच्चों को बारिश भगाने वाली बातें सिखा रहे हैं। इसके मुकाबले महाराष्ट्र का उदाहरण देखा जा सकता है, जहां सूखा पड़ने के बावजूद बारिश को बुलाने के लिए सकारात्मक लोकगीत रचे गए हैं, जैसे कि ‘येरे-येरे पावसा’। यदि हम इसी तरह कविताएं गा-गाकर बारिश को भगाते रहे, तो आने वाली पीढ़ी बारिश का महत्व कभी नहीं समझ पाएगी और उसे सहेजने की बात तो बहुत दूर की बात हो जाएगी।

भारतीय संगीत और राग मल्हार की परंपरा
दूसरी ओर, हमारे हिंदुस्तानी कण्ठ-संगीत में वर्षा के आह्वान के लिए अत्यंत समृद्ध परंपरा मौजूद है। यहां राग मल्हार एक बहुत बड़ा राग-परिवार है, जिसके अंतर्गत कई प्रमुख राग आते हैं। इन रागों में मियां की मल्हार, गौड़ मल्हार, मेघ मल्हार, सूर मल्हार, रामदासी मल्हार, नट मल्हार, जयंत मल्हार, शुद्ध मल्हार और धानी मल्हार जैसे नाम शामिल हैं। इन सभी रागों की बंदिशों में वर्षा का बहुत ही सुंदर स्वागत और आह्वान किया जाता है। उदाहरण के लिए, मियां की मल्हार में ‘घन गरजत- बरसत बूंद-बूंद…’, मेघ मल्हार में ‘सखी बदरा बरसे झनन-झनन…’ और गौड़ मल्हार में ‘गरजत, बरसत सावन आयो रे…’ जैसी बंदिशें मिलती हैं। दुर्भाग्यवश, आज इन रागों को गाने वाले और सुनने वाले दोनों ही लगातार कम होते जा रहे हैं।
प्राकृतिक आपदाओं और बाढ़ का दर्द
अंत में बात आती है बिहार जैसी जगहों पर आने वाली बाढ़ की, जिसके कारण बरसों से लोग बेघर होते आए हैं। महान कवि कुसुमाग्रज ने अपनी एक कविता के माध्यम से इस दर्द को बहुत ही गहराई से बयां किया है। उस कविता में गंगा मैया के मेहमान बनकर आने और कुटिया में रहने का वर्णन मिलता है, जहां बाढ़ के बाद केवल दीवारों का चूरा, बुझा हुआ चूल्हा और पलकों के नीचे पानी के कुछ कतरे ही शेष रह जाते हैं। प्रकृति के इन अलग-अलग रूपों और उनसे जुड़ी हमारी सांस्कृतिक धरोहर को सहेजने की आज सख्त जरूरत है।

