सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये ने अपने तथाकथित ‘मक्का गठजोड़’ या ‘मुस्लिम-नाटो’ को सक्रिय करने की दिशा में कदम उठाए हैं। जब पहली बार हूती मिसाइलें सऊदी अरब पर गिरी थीं, तब यह सवाल सामने आया था कि क्या पाकिस्तान सऊदी अरब की रक्षा के लिए आगे आएगा। हालांकि, पाकिस्तान ने लगभग एक महीने तक इस मामले में कोई कार्रवाई नहीं की थी, जिसके पीछे कई ठोस और व्यावहारिक कारण मौजूद थे।

सैन्य ताकत और रणनीतिक गुंजाइश का अभाव
कम से कम सैन्य क्षमता की कमी को इसकी वजह नहीं माना जा सकता है। ग्लोबल फायरपावर इंडेक्स के अनुसार पाकिस्तान 14वें स्थान पर आता है। उसके पास भारी संख्या में सक्रिय और रिजर्व सैनिक मौजूद हैं। इसके अलावा, वायुसेना के पास सैकड़ों फाइटर जेट और परमाणु हथियारों का भंडार भी है। इसके बावजूद, इन सैन्य संसाधनों का उपयोग करने के लिए जरूरी रणनीतिक गुंजाइश की कमी रही है, जिसके मुख्य रूप से राजनीति, प्राथमिकताएं और पैसों से जुड़े कारण हैं।
राजनीतिक और कूटनीतिक कारण
पाकिस्तान ने खुद को ईरान के साथ चल रहे संघर्ष में एक मध्यस्थ के रूप में पेश किया है। उसने अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत की मेजबानी की थी तथा युद्धविराम में भी मदद पहुंचाई थी। पाकिस्तान इस भूमिका को आगे भी बनाए रखना चाहता है क्योंकि इससे उसे रणनीतिक फायदा और प्रभाव मिलता है। इस उद्देश्य के लिए ईरान के साथ अच्छे संबंध बनाए रखना अनिवार्य है, खासकर तब जब दोनों देशों के बीच लंबी सीमा है और ऊर्जा आपूर्ति तथा सीमाई तनाव जैसे संवेदनशीलता के मुद्दे जुड़े हुए हैं।
घरेलू प्राथमिकताएं और आर्थिक चुनौतियां
पाकिस्तान के सामने अपनी भौगोलिक सीमाओं के पास अत्यधिक गंभीर चुनौतियां मौजूद हैं। अफगानिस्तान के साथ सीमा पर टीटीपी यानी पाकिस्तानी तालिबान के समर्थन को लेकर हिंसक झड़पें और सीमा पार हमले हो चुके हैं। इसके अतिरिक्त, पूर्वी सीमा पर सेना की बड़ी तैनाती, देश के भीतर आतंकवाद का बढ़ता खतरा, पीओके में अशांति और बलूचिस्तान में उग्रवाद के कारण पाकिस्तान भारी दबाव में है।

दूसरा बड़ा पहलू अर्थव्यवस्था का है। किसी अन्य देश के लिए युद्ध लड़ना अत्यधिक खर्चीला होता है और पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था इस तरह का भारी खर्च उठाने में पूरी तरह असमर्थ है। देश की आर्थिक वृद्धि दर कम रहने का अनुमान है, महंगाई दर ऊंची है, और विदेशी मुद्रा भंडार पूरी तरह से अन्य देशों से लिए गए उधार और अंतरराष्ट्रीय कर्ज पर निर्भर है।
इन सभी परिस्थितियों के चलते पाकिस्तान टकराव से बचना चाहता है और हूतियों के साथ राजनीतिक चर्चा का पक्षधर है। ऐसी स्थितियों को देखते हुए सऊदी अरब को अन्य विकल्पों पर भी विचार करने की आवश्यकता है, क्योंकि तमाम सैन्य संसाधनों के बावजूद पाकिस्तान की सेना के सामने अपनी घरेलू और बाहरी वास्तविक सीमाएं बनी हुई हैं।

