भारत ने साल 2047 तक अपनी कच्चे इस्पात के निर्माण की क्षमता को लगभग तीन गुना बढ़ाकर 604 मिलियन टन करने का लक्ष्य रखा है। राष्ट्रीय इस्पात नीति – विजन 2047 के नए मसौदे के अनुसार, इस योजना का उद्देश्य देश में तैयार इस्पात की मांग को बढ़ाकर 505 मिलियन टन करना और आयातित कोकिंग कोल पर निर्भरता को कम करना है।

उत्पादन क्षमता और प्रति व्यक्ति खपत में वृद्धि
प्रस्तावित नीतिगत ढांचे के तहत प्रति व्यक्ति वार्षिक इस्पात की खपत को मौजूदा 116 किलोग्राम से तिगुना करके 302 किलोग्राम तक पहुंचाने का अनुमान लगाया गया है। देश में कच्चे इस्पात का उत्पादन वित्त वर्ष 2014-15 के 89 मिलियन टन से बढ़कर 2025-26 में 170 मिलियन टन हो चुका है, जबकि स्थापित इस्पात निर्माण क्षमता लगभग 220 मिलियन टन प्रति वर्ष तक पहुंच गई है। बुनियादी ढांचे और निर्माण क्षेत्र की घरेलू इस्पात खपत में लगभग 67 प्रतिशत की हिस्सेदारी है, जबकि ऑटोमोबाइल, इंजीनियरिंग सामान और पैकेजिंग जैसे क्षेत्र शेष मांग को पूरा करते हैं।
कच्चे माल की सुरक्षा और कार्बन उत्सर्जन में कमी
इस्पात निर्माण की लागत में कच्चे माल की हिस्सेदारी लगभग 65 से 70 प्रतिशत होती है, जिससे कच्चे माल की सुरक्षा उद्योग के लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। देश अपनी कोकिंग कोल आवश्यकताओं का लगभग 92 प्रतिशत आयात करता है, और इस नीति में घरेलू खनन बढ़ाने, कोयला वॉशरी स्थापित करने तथा विदेशों से आयात के स्रोतों में विविधता लाने के उपाय सुझाए गए हैं। इसके अलावा, नीति में स्वच्छ इस्पात उत्पादन पर विशेष जोर दिया गया है। ऊर्जा दक्षता में सुधार, नवीकरणीय बिजली के उपयोग और हाइड्रोजन आधारित इस्पात निर्माण जैसी तकनीकों के माध्यम से औसत कार्बन उत्सर्जन तीव्रता को 2047 तक कम करने का लक्ष्य रखा गया है।
आधुनिक तकनीक और मूल्य वर्धन पर जोर
यह मसौदा इस्पात क्षेत्र में विशेष और उच्च मूल्य वाले उत्पादों की घरेलू क्षमताओं को मजबूत करने पर भी ध्यान केंद्रित करता है। इस्पात स्क्रैप संग्रह प्रणालियों के विकास और विनिर्माण क्षेत्र में कृत्रिम बुद्धिमत्ता और स्वचालन जैसी डिजिटल तकनीकों के उपयोग से उत्पादकता और संसाधन दक्षता में सुधार होने की उम्मीद है। इस संपूर्ण नीति के सफल क्रियान्वयन के लिए केंद्र सरकार, राज्य सरकारों और उद्योग जगत के बीच समन्वित प्रयासों की आवश्यकता होगी।

