बर्लिन ग्लोबल डायलॉग 2026 के मंच से केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने यूरोपीय देशों और विकसित राष्ट्रों को खरी-खरी सुनाई है। एक सत्र के दौरान उन्होंने यह साफ किया कि वर्तमान जलवायु संकट की ऐतिहासिक वजहें पश्चिमी देश हैं और इसके लिए भारत जैसे विकासशील मुल्कों पर उंगली नहीं उठाई जा सकती।

तथ्यों के आधार पर रखा पक्ष
जब चर्चा में शामिल एक अन्य वक्ता ने इस संकट के लिए हर किसी को कसूरवार बताया, तो मंत्री महोदय ने इसका विरोध किया। उन्होंने तथ्य पेश करते हुए बताया कि पृथ्वी की कुल आबादी का लगभग सत्रह प्रतिशत हिस्सा भारत में बसता है, फिर भी वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में यहां की भागीदारी तीन प्रतिशत से भी कम है। इसके विपरीत, पश्चिमी राष्ट्रों ने तरक्की के शुरुआती दौर में कम लागत वाली ऊर्जा के वास्ते भारी मात्रा में कोयला इस्तेमाल किया था।
यूरोपीय नीतियों की आलोचना
पीयूष गोयल ने यूरोप की सुरक्षात्मक व्यापार नीतियों पर भी कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने उल्लेख किया कि कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म और इस्पात पर पचास प्रतिशत तक का भारी आयात शुल्क जैसी व्यवस्थाएं अंततः यूरोप के लिए ही परेशानी का सबब बनेंगी। इन कदमों से वहां रहने का खर्च बढ़ेगा, उद्योगों की क्षमता प्रभावित होगी और अंततः वहां के आम नागरिकों को ही हानि उठानी पड़ेगी।
पेरिस समझौते के वादों की अनदेखी
विकसित देशों के दोहरे रवैये पर कटाक्ष करते हुए उन्होंने दो हजार पंद्रह के पेरिस समझौते की याद दिलाई। इस करार के तहत अमीर देशों ने विकासशील और द्वीपीय क्षेत्रों को प्रति वर्ष सौ अरब डॉलर देने का वचन दिया था, मगर इतने वर्षों बाद भी भारत को इस सहायता राशि में से एक भी रुपया प्राप्त नहीं हुआ है। तमाम वैश्विक दबावों के बावजूद, भारत आज दुनिया के सबसे तीव्र गति से आगे बढ़ने वाले स्वच्छ ऊर्जा अभियानों में से एक का नेतृत्व कर रहा है।

