लोकसभा के पूर्व महासचिव पीडी आचार्य ने एक विशेष बातचीत में स्पष्ट किया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेंद्र कुमार को हटाने के लिए विपक्ष को नियमों और प्रक्रियाओं के तहत बेहद सावधानी से आरोपों का खाका तैयार करना होगा। हाल ही में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कहा था कि सीईसी को हटाने की किसी भी नई याचिका की जांच संसदीय नियमों के मुताबिक की जाएगी।

विपक्ष पिछले कुछ समय से चुनाव आयोग के कुछ फैसलों और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर लगातार सवाल उठा रहा है। विपक्षी दल विभिन्न राज्यों में हुए चुनावों को लेकर सत्तारूढ़ दल पर गंभीर आरोप लगा रहे हैं और इसके विरोध में आगामी दिनों में राष्ट्रीय राजधानी में विरोध प्रदर्शन करने की योजना बना रहे हैं। दूसरी ओर, चुनाव आयोग का यह कहना रहा है कि उसके सभी निर्णय कानूनी दायरे में रहकर लिए गए हैं। इससे पहले भी राज्यसभा और लोकसभा अध्यक्ष के समक्ष इस तरह के प्रस्ताव प्रस्तुत किए जा चुके हैं, जिन पर प्रक्रिया जारी है।
महाभियोग के संवैधानिक आधार
संविधान विशेषज्ञों के अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त को केवल दो विशिष्ट आधारों पर ही उनके पद से हटाया जा सकता है, जो कि ‘साबित कदाचार’ और ‘असमर्थता’ हैं। आचार्य के अनुसार, यदि कोई अधिकारी कानून या संविधान के विपरीत कार्य करता है या भ्रष्टाचार में लिप्त पाया जाता है, तो उसे कदाचार की श्रेणी में रखा जाता है। वहीं, असमर्थता का संबंध व्यक्ति की शारीरिक या मानसिक कार्यक्षमता से है, जिसके कारण वह अपने दायित्वों का निर्वहन करने में असमर्थ हो जाता है।
संसदीय और न्यायिक प्रक्रिया
यदि लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति इस प्रस्ताव को स्वीकार करते हैं, तो आगे की प्रक्रिया के तहत एक उच्च स्तरीय तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन किया जाता है। इस समिति में उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के साथ-साथ एक प्रतिष्ठित न्यायविद् शामिल होते हैं। यह प्रक्रिया दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत से पारित होने के पश्चात राष्ट्रपति के पास जाती है, जिनके आदेश के बाद ही अंतिम कार्रवाई संभव होती है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस पूरी प्रक्रिया में विपक्ष के सामने कानूनी और राजनीतिक दोनों स्तर पर कई चुनौतियां बनी हुई हैं।

