बदलती वैश्विक व्यवस्था में संयुक्त राष्ट्र महासभा की प्रासंगिकता और चुनौतियाँ

बदलती वैश्विक व्यवस्था में संयुक्त राष्ट्र महासभा की प्रासंगिकता और चुनौतियाँ

संयुक्त राष्ट्र महासभा स्थापना के आठ दशक बाद भी दुनिया भर के 193 सदस्य देशों के लिए एक प्रमुख और व्यापक बहुपक्षीय मंच बनी हुई है। युद्ध, शांति, जलवायु परिवर्तन और वैश्विक कूटनीति के बीच आज भी इस मंच की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। वर्तमान में यह वैश्विक संस्था कई गंभीर चुनौतियों का सामना करते हुए अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति का केंद्र बनी हुई है।

बदलती वैश्विक व्यवस्था में संयुक्त राष्ट्र महासभा की प्रासंगिकता और चुनौतियाँ

ऐसी रही है स्थापना से लेकर अब तक की यात्रा

वर्ष 1945 में संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के समय इसके संस्थापकों ने मुख्य निर्णय सुरक्षा परिषद में होने की कल्पना की थी। हालांकि, शीत युद्ध के दौरान बड़ी शक्तियों के बीच बढ़ते मतभेदों और सुरक्षा परिषद में गतिरोध के कारण कई राजनीतिक बहसें और संकट प्रबंधन के कार्य महासभा की ओर स्थानांतरित हो गए। कोरियाई संकट और 1956 के स्वेज़ संकट के दौरान महासभा ने वैश्विक कूटनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और शांतिरक्षा अभियानों की नींव रखी।

वैश्विक दक्षिण का उभार और नई प्राथमिकताएँ

संसार के विभिन्न हिस्सों में उपनिवेशवाद के अंत और नए स्वतंत्र देशों के जुड़ने से महासभा की सदस्यता में तेजी से विस्तार हुआ। 1960 और 1970 के दशकों में विकासशील देशों ने एकजुट होकर दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद, औपनिवेशिक शासन और वैश्विक आर्थिक असमानता जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। इस प्रकार महासभा वैश्विक दक्षिण के देशों के लिए अपनी आवाज बुलंद करने का एक सशक्त माध्यम बन गई।

आधुनिक चुनौतियाँ और आज की प्रासंगिकता

वर्तमान समय में जी7 और ब्रिक्स जैसे कई अन्य कूटनीतिक और आर्थिक मंच भी अस्तित्व में हैं, इसके बावजूद संयुक्त राष्ट्र महासभा का महत्व कम नहीं हुआ है। आज भी दुनिया के छोटे और मध्यम आकार के देश वैश्विक मामलों पर अपनी बात रखने के लिए इसी मंच का रुख करते हैं। जलवायु संकट, वैश्विक स्वास्थ्य, सतत विकास और भू-राजनीतिक तनाव के इस दौर में महासभा अंतरराष्ट्रीय सहयोग और संवाद का अनिवार्य केंद्र बनी हुई है।

Anju Kunwar

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