उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में अभी करीब छह महीने का समय शेष है, लेकिन राज्य की राजनीतिक गतिविधियों में अभी से तेजी देखने को मिल रही है। विभिन्न राजनीतिक दल मतदाताओं को अपने पक्ष में करने के लिए नए मुद्दे तलाशने में जुट गए हैं। इसी क्रम में कांग्रेस पार्टी भी दलित समुदाय के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने के प्रयास कर रही है और राज्य में अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने की कोशिश में है।

दलित मतदाताओं का बदलता रुझान
एक समय था जब उत्तर प्रदेश में दलित वर्ग के मतदाता बड़ी संख्या में कांग्रेस का समर्थन करते थे। हालांकि, समय के साथ राजनीतिक समीकरण बदले और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) इस वर्ग की सबसे लोकप्रिय पसंद बनकर उभरी। बसपा को विशेष रूप से जाटव समुदाय का बड़ा समर्थन मिला, हालांकि हालिया वर्षों के चुनावों में इसमें कुछ गिरावट दर्ज की गई है। आंकड़े बताते हैं कि 2007 के चुनाव में बसपा को जहां बड़ा समर्थन हासिल हुआ था, वहीं 2022 के विधानसभा चुनावों तक आते-आते जाटव और गैर-जाटव दोनों ही वर्गों में पार्टी का समर्थन प्रतिशत कम हुआ है।
भाजपा की बढ़ती पैठ और बसपा का घटता वोट शेयर
विभिन्न चुनावी आंकड़ों के अनुसार, बसपा के कमजोर होने से मिलने वाला फायदा मुख्य रूप से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को मिलता दिखाई दिया है। गैर-जाटव दलितों के साथ-साथ जाटव मतदाताओं के बीच भी पिछले कुछ वर्षों में भाजपा या एनडीए के समर्थन में वृद्धि दर्ज की गई है। यही वजह है कि बसपा का कुल वोट शेयर जो कभी ऊंचाई पर था, वह पिछले चुनावों में घटकर काफी नीचे आ गया है, जबकि इस दौरान भाजपा और अन्य प्रमुख दलों के वोट शेयर में इजाफा हुआ है।

कांग्रेस की वापसी की कोशिशें
वर्तमान में दलित मतदाताओं के बीच कांग्रेस का समर्थन काफी कम है और दोनों मुख्य दलित समूहों में पार्टी का वोट शेयर आमतौर पर एकल अंक में ही रहा है। इसके बावजूद, कांग्रेस इस वर्ग के बीच अपनी उपस्थिति दर्ज कराने और यह संदेश देने का कोई अवसर नहीं छोड़ रही है कि वह दलित हितों के प्रति गंभीर है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि कौन सा दल इन मतदाताओं को बड़े पैमाने पर अपनी ओर आकर्षित कर पाने में सफल होता है।

