उत्तर प्रदेश की राजनीतिक बिसात पर कांग्रेस पार्टी ने अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव करते हुए नए समीकरण साधने शुरू कर दिए हैं। पार्टी ने एक ब्राह्मण महिला नेता को प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी है, जिसे भाजपा के गढ़ में सेंध लगाने के एक बड़े और साहसिक कदम के रूप में देखा जा रहा है। उत्तर प्रदेश में अपने राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही कांग्रेस के लिए यह फैसला काफी अहम माना जा रहा है।

पुराने फॉर्मूले की ओर वापसी
विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस एक बार फिर इंदिरा गांधी के समय के राजनीतिक समीकरणों की ओर लौटती नजर आ रही है। अतीत में ब्राह्मण, दलित और अल्पसंख्यक वोटों के मजबूत गठजोड़ के सहारे पार्टी ने राज्य में सत्ता हासिल की थी। हालांकि, राम मंदिर आंदोलन के उभार के बाद से ब्राह्मण समुदाय बड़े पैमाने पर भाजपा के साथ जुड़ गया था। राहुल गांधी ने पहले ओबीसी वोटों और मंडल की राजनीति पर जोर दिया था, लेकिन अब पार्टी नए सिरे से पुराने सामाजिक ताने-बाने को पुनर्जीवित करने का प्रयास कर रही है।
नए पदाधिकारियों की नियुक्ति और सामाजिक गठजोड़
हालिया संगठनात्मक नियुक्तियों में इस नई रणनीति की झलक साफ दिखाई देती है। पार्टी ने प्रदेश अध्यक्ष पद पर ब्राह्मण चेहरे को मौका दिया है, जबकि कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में एक मुस्लिम चेहरे को जिम्मेदारी सौंपी गई है। इसके अलावा, वरिष्ठ उपाध्यक्ष पदों पर दलित और अत्यंत पिछड़ा वर्ग (EBC) समुदाय से आने वाले नेताओं को शामिल किया गया है। इन फैसलों में प्रियंका गांधी वाड्रा की भूमिका और छाप भी प्रमुख मानी जा रही है, क्योंकि नियुक्त किए गए कई नेता उनके करीबी माने जाते हैं।

आगामी चुनावों की तैयारी और गठबंधन
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि आगामी चुनावों को लेकर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच समन्वय पर भी ध्यान दिया जा रहा है। उत्तर प्रदेश का आगामी राजनीतिक जनादेश भविष्य की राष्ट्रीय राजनीति के लिए भी एक बड़ी जमीन तैयार कर सकता है। एक तरफ कांग्रेस और समाजवादी पार्टी अपने सामाजिक गठजोड़ को मजबूत करने में जुटी हैं, वहीं दूसरी तरफ सत्ताधारी दल के मुकाबले के लिए यह राजनीतिक मुकाबला बेहद दिलचस्प होता जा रहा है।

