बेगूसराय में पारंपरिक तरीके से हुआ मां दुर्गा की प्रतिमा का विसर्जन

बेगूसराय में पारंपरिक तरीके से हुआ मां दुर्गा की प्रतिमा का विसर्जन

बिहार के बेगूसराय जिले के अंतर्गत आने वाले गढ़हरा क्षेत्र के बरौनी स्थित राजवाड़ा सार्वजनिक दुर्गा मंदिर से जुड़ी परंपरा के अनुसार, इस वर्ष भी मां दुर्गा की प्रतिमा का विसर्जन श्रद्धापूर्वक संपन्न हुआ। सोमवार को पूर्णिमा के पावन अवसर पर सिमरिया धाम में गंगा नदी में यह विसर्जन किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में स्थानीय श्रद्धालु और क्षेत्र के लोग शामिल हुए। इस दौरान सभी ने मिलकर पारंपरिक अनुष्ठानों को पूरा किया और मां को नम आंखों से विदाई दी।

बेगूसराय में पारंपरिक तरीके से हुआ मां दुर्गा की प्रतिमा का विसर्जन

वर्ष 1972 से चली आ रही है पखवाड़े भर की परंपरा

बीहट नगर परिषद के अंतर्गत स्थित बरौनी के राजवाड़ा में सन 1972 से ही एक विशेष परंपरा का पालन किया जाता रहा है। यहां दुर्गापूजा को पखवाड़े भर यानी लगभग पंद्रह दिनों तक मनाने का विधान है। अन्य स्थानों की तुलना में यहां उत्सव का दायरा लंबा होता है और मां दुर्गा की प्रतिमा का विसर्जन सामान्य दिनों के बजाय सीधे पूर्णिमा के दिन किया जाता है। स्थानीय लोग हर साल इस आयोजन को बेहद धूमधाम और पारंपरिक रूप से मनाते हैं, जो इस पूरे इलाके की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान बन चुका है।

सांस्कृतिक कार्यक्रमों और नाटकों का भव्य आयोजन

प्रतिमा विसर्जन से पहले इस क्षेत्र में एक सप्ताह तक लगातार सांस्कृतिक कार्यक्रमों की धूम रही। हर दिन संध्याकाल में होने वाले इन कार्यक्रमों का स्थानीय लोगों ने भरपूर आनंद उठाया। इन आयोजनों की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि इसमें ग्रामीण और स्थानीय कलाकारों ने अपनी कला का प्रदर्शन किया। कलाकारों ने अपनी प्रस्तुतियों के माध्यम से लोक संस्कृति को बढ़ावा देने का सराहनीय कार्य किया। इसके साथ ही, समाज में फैली विभिन्न कुरीतियों पर करारा प्रहार करते हुए जागरूकता फैलाने वाले नाटक भी मंचित किए गए, जिन्हें दर्शकों ने बेहद पसंद किया और कलाकारों की प्रतिभा की प्रशंसा की।

लोक संस्कृति का संरक्षण और जागरूकता

आयोजकों और स्थानीय नागरिकों के अनुसार, आधुनिकता के दौर में समाज से तेजी से विलुप्त हो रही लोक संस्कृति को जीवंत बनाए रखने के लिए ऐसे आयोजनों की महत्ता बहुत अधिक है। इन सांस्कृतिक मंचों के माध्यम से पश्चिमी सभ्यता के बढ़ते प्रभाव को रोकने और अपनी प्राचीन लोक संस्कृति की रक्षा करने का संदेश दिया जाता है। ग्रामीण कलाकारों द्वारा प्रस्तुत नाटकों ने समाज में सकारात्मक संदेश देने का काम किया, जिससे स्थानीय लोगों और विशेषकर युवा पीढ़ी को अपनी पारंपरिक जड़ों से जुड़े रहने की प्रेरणा मिलती है।

Anju Kunwar

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