जीवन में जब भी ईश्वर की आराधना करने का अवसर मिले, तो अपनी समझदारी का परिचय देते हुए उनसे कुछ ऐसा मांगना चाहिए जो आम लोगों या बड़े तपस्वियों के लिए भी सुलभ न हो। पंडित विजयशंकर मेहता के आध्यात्मिक कॉलम में इस बात पर प्रकाश डाला गया है कि भगवान के सामने किस प्रकार की प्रार्थना करनी चाहिए और अपनी बुद्धि का सही दिशा में उपयोग कैसे किया जा सकता है।

काकभुशुंडि और भगवान श्रीराम का प्रसंग
आध्यात्मिक कथाओं का हवाला देते हुए आलेख में बताया गया है कि जब भगवान श्रीराम ने काकभुशुंडि जी को वरदान मांगने के लिए कहा, तो उन्होंने ऐसी दुर्लभ भक्ति की मांग की जो बड़े-बड़े संतों के पास भी नहीं होती है। उनकी इस चतुराई और समझदारी को देखकर श्रीराम अत्यंत प्रसन्न हुए और कहा कि तुमने वही मांगा है जो मुझे सबसे अधिक प्रिय है।
मस्तिष्क के उपयोग और कल्पना की शक्ति
विज्ञान के दृष्टिकोण से हमारे मस्तिष्क का एक मुख्य हिस्सा सेरिब्रम होता है, जो हमारी बुद्धि और चतुराई दोनों को नियंत्रित करता है। यह चतुराई ही हमें यह सिखाती है कि हमारी बुद्धि का उपयोग किस प्रकार किया जाना चाहिए। इसलिए यह आवश्यक है कि व्यक्ति दैनिक जीवन में कुछ समय निकालकर आंखें बंद करे और यह कल्पना करे कि ईश्वर उसके ठीक सामने खड़े हैं।

ईश्वर के समक्ष बुद्धिमत्ता का प्रदर्शन
जब कोई व्यक्ति ईश्वर के सामने अपनी बुद्धिमत्ता का प्रयोग करते हुए सांसारिक मोह-माया के बजाय सच्ची और दुर्लभ भक्ति की मांग करता है, तो परमात्मा भी यह समझ जाते हैं कि उनका यह भक्त वास्तव में समझदार है। ऐसे भक्त की चतुराई और भावना देखकर ईश्वर भी रीझ जाते हैं और अपनी कृपा बरसाते हैं।

