दुनियाभर में स्क्रीन-फोकस्ड आबादी के बीच यह बात साफ तौर पर महसूस की जाने लगी है कि आधुनिक समाज में सबसे मुश्किल से मिलने वाली चीज दोस्त हैं। अकेलापन अब कई लोगों के लिए एक ऐसा सीक्रेट बन गया है, जिससे शर्म महसूस होती है। यही वजह है कि लोग अब हजारों अनजान लोगों के सामने अपना अकेलापन स्वीकार कर रहे हैं, ताकि कोई उनके साथ वक्त बिता सके। अमेरिका और अन्य जगहों पर लोग इस बात के लिए प्रयास कर रहे हैं कि उन्हें कुछ गैर-रोमांटिक कनेक्शन मिल सकें और वे अपनी भावनाएं खुलकर जाहिर कर रहे हैं।

दोस्ती की गुहार और सोशल मीडिया का सहारा
कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी में सेंटर फॉर फ्रेंडशिप रिसर्च की डायरेक्टर जैमी क्रेम्स के अनुसार, इस तरह की गुहार लगाना किसी की दोस्ती वाली ‘टैक्सी लाइट’ की तरह है, जो अकेलेपन को लेकर उनकी ईमानदारी को दर्शाती है। एविएशन इंडस्ट्री के इस यूनिवर्सल टर्म का इस्तेमाल तब होता है जब रनवे पर कलर-कोडेड नीली लाइटों से विमान को उतारा जाता है, जो यह स्पष्ट करता है कि बहुत से लोग अपनी जिंदगी की भी सुरक्षित लैंडिंग चाहते हैं। क्रेम्स का यह भी कहना है कि अगर दोस्ती कोई दवा है, तो शायद यह सबसे ज्यादा लिखी जाने वाली दवा होगी।
वयस्क दोस्ती पर विशेषज्ञता रखने वाली क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट मिरियम किर्मायर का मानना है कि ऑनलाइन नए दोस्त बनाने के लिए सही टेक्नीक की जरूरत होती है। बेहतर है कि लोग अपनी जरूरत बिल्कुल साफ बताएं, जैसे कि वे किसी खास गतिविधि के लिए साथी तलाश रहे हैं। यही कारण है कि आज टिकटॉक जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर ‘फ्रेंडशिप एप्लिकेशन’ या वीडियो तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं। कई लोग बिना किसी झिझक के अपने अकेलेपन को दूर करने और अपने जैसे दूसरे लोगों को ढूंढने के लिए ऑनलाइन वीडियो का सहारा ले रहे हैं और इसके जरिए सार्थक रिश्ते भी बना रहे हैं।
क्यों घट रहा है सामाजिक दायरा और क्या है ‘थर्ड स्पेस’?
सोशल साइकोलॉजिस्ट्स के अनुसार, एक-दो दशक पहले की तुलना में लोग अब कम सोशलाइज करते हैं और उनके करीबी दोस्त भी कम हैं। इसके पीछे कई मुख्य वजहें हैं, जिनमें घर और ऑफिस से अलग ‘थर्ड स्पेस’ का लगातार घटना, स्क्रीन का हमारे समय पर जरूरत से ज्यादा हावी होना और वयस्क जीवन में जिम्मेदारियों का अलग तरह से होना शामिल है।

‘थर्ड स्पेस’ उस सामाजिक माहौल को कहा जाता है जो उन दो प्राथमिक जगहों से अलग होता है जहां लोग अपना ज्यादातर समय बिताते हैं—यानी पहली जगह घर और दूसरी ऑफिस या स्कूल। अर्बन सोशियोलॉजिस्ट रे ओल्डेनबर्ग द्वारा ईजाद किया गया यह शब्द कम्युनिटी लाइफ का मुख्य आधार माना जाता है, जो व्यापक और रचनात्मक सामाजिक मेलजोल को बढ़ावा देता है।
संतोषपूर्ण जीवन के लिए रिश्तों की अहमियत
अमेरिकन एंटरप्राइज इंस्टीट्यूट के सर्वे सेंटर ऑफ अमेरिकन लाइफ के आंकड़ों के मुताबिक, मोबाइल से जुड़े रहने वाली इस आबादी में ज्यादा से ज्यादा लोग अब यह महसूस करने लगे हैं कि संतोषपूर्ण जीवन के लिए दोस्त उतने ही जरूरी हैं जितनी शादी या बच्चे। हालांकि, यह भी सच है कि ऑनलाइन बनने वाले बहुत-से रिश्ते आसानी से स्थायी दोस्ती में नहीं बदल पाते हैं, और कई बार सैकड़ों लोगों की दिलचस्पी के बावजूद सच्ची दोस्ती एक या दो लोगों से ही हो पाती है। अंततः यह सोचने की जरूरत है कि क्या हमें अपना जीवन स्क्रीन-फोकस्ड एकाकी आबादी की तरह जीना चाहिए जो अब दोस्तों के लिए विज्ञापन दे रही है, या फिर हमें ऐसे संबंध और स्पेस तैयार करने चाहिए जो हमारी जिंदगी को सार्थक बना सकें।

