सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: इंटरनेट का अधिकार बना मौलिक अधिकार, सुरक्षा पर भी जोर

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: इंटरनेट का अधिकार बना मौलिक अधिकार, सुरक्षा पर भी जोर

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में इंटरनेट और इसके इस्तेमाल के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में स्पष्ट मान्यता प्रदान की है। न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और के. विनोद चंद्रन की पीठ ने बच्चों को ऑनलाइन शोषण से बचाने से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान यह अहम निर्णय सुनाया। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि बच्चों को इंटरनेट से पूरी तरह दूर करने की बजाय इसे उनके लिए अधिक सुरक्षित बनाने के प्रयास किए जाने चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: इंटरनेट का अधिकार बना मौलिक अधिकार, सुरक्षा पर भी जोर

नागरिकों को मिला नया संवैधानिक आधार

इस फैसले के बाद अब नागरिकों के पास इंटरनेट की पहुंच सीमित करने वाले सरकारी कदमों को अदालत में चुनौती देने के लिए एक ठोस संवैधानिक आधार मिल गया है। इसमें सार्वजनिक व्यवस्था का हवाला देकर बार-बार इंटरनेट सेवा बंद किए जाने जैसे प्रतिबंध भी शामिल हैं। हालांकि ये पाबंदियां पहले भी न्यायिक समीक्षा के दायरे में थीं, लेकिन अब इनका विरोध करना और भी आसान हो गया है।

सरकार की बढ़ती जिम्मेदारी और अधिकार का दायरा

किसी सुविधा को मौलिक अधिकार घोषित करने का अर्थ केवल सरकारी हस्तक्षेप रोकना नहीं है, बल्कि इससे नागरिकों को सरकार से बेहतर सुविधाओं की मांग करने का अधिकार भी मिलता है। चूंकि प्रशासनिक तंत्र और वित्तीय संसाधन सरकारों के पास होते हैं, इसलिए बुनियादी ढांचा तैयार करने की मुख्य जिम्मेदारी उन्हीं की होती है। सूचना के अधिकार और शिक्षा के अधिकार के इतिहास से यह स्पष्ट होता है कि कैसे अदालती फैसलों के बाद आगे चलकर कानून और संस्थाएं अस्तित्व में आईं।

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: इंटरनेट का अधिकार बना मौलिक अधिकार, सुरक्षा पर भी जोर

भविष्य की संभावनाएं और चुनौतियां

विशेषज्ञों का मानना है कि इंटरनेट तक पहुंच के अधिकार को लेकर भी भविष्य में ऐसे ही सकारात्मक बदलाव देखने को मिल सकते हैं। अदालतें केवल इस अधिकार की कानूनी नींव रख सकती हैं, लेकिन इसे जमीन पर उतारने के लिए सरकारों को सक्रिय रूप से काम करना होगा और आवश्यक संसाधन जुटाने होंगे।

Anju Kunwar

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