भारत में मोटापे की समस्या तेजी से पैर पसार रही है और एक बड़े स्वास्थ्य संकट के रूप में उभर रही है। देश में 15 से 49 वर्ष की आयु वर्ग की लगभग हर तीन में से एक महिला और चार में से एक से अधिक पुरुष सामान्य से अधिक वजन या मोटापे से पीड़ित हैं। इस स्थिति के लिए अक्सर पश्चिमी संस्कृति, वैश्वीकरण और फास्ट फूड को दोषी ठहराया जाता है, जबकि वास्तविकता इससे काफी अलग है।

पारंपरिक खानपान और कैलोरी की मात्रा
अक्सर लोग अपनी जीवनशैली में आ रहे बदलावों का ठीकरा पश्चिम पर फोड़ते हैं, लेकिन भारतीय खानपान में ऐसे कई व्यंजन पहले से मौजूद हैं जो वजन बढ़ाने के लिए काफी हैं। उदाहरण के लिए, छोले-भटूरे और जलेबी जैसी चीजें कैलोरी का बड़ा भंडार होती हैं। पारंपरिक मिठाइयां, हलवा और गरिष्ठ भोजन में कई पश्चिमी व्यंजनों से भी ज्यादा कैलोरी पाई जाती है। समोसे, पकौड़े, पूरियां और मिठाइयों का हमारे यहां सेवन लंबे समय से होता आ रहा है, जिनका पश्चिम से कोई लेना-देना नहीं है।
आर्थिक समृद्धि और भोजन की थाली
वैश्वीकरण और बढ़ते मोटापे के बीच यदि कोई संबंध है, तो वह केवल आर्थिक समृद्धि के जरिए आया है। आय बढ़ने से परिवारों की क्रय शक्ति में सुधार हुआ है, जिससे वे अधिक भोजन और उन चीजों का नियमित सेवन करने लगे हैं जो पहले कभी-कभार ही नसीब होती थीं। चावल और गेहूं से बने भारी व्यंजनों को अधिक मात्रा में परोसना हमारी संस्कृति का हिस्सा रहा है। सीमित मात्रा में ये चीजें नुकसानदेह नहीं होतीं, लेकिन भोजन की बढ़ती मात्रा और बार-बार खाने की आदत मोटापे को बुलावा देती है।

शारीरिक श्रम में कमी और जीवनशैली में बदलाव
मशीनीकरण के आने से हमारे दैनिक जीवन में शारीरिक श्रम की जरूरत काफी कम हो गई है। कृषि कार्यों से लेकर दफ्तरों की नौकरियों तक, हर जगह लोग निष्क्रिय जीवनशैली जीने लगे हैं। पैदल चलने या साइकिल चलाने के बजाय वाहनों का उपयोग बढ़ा है, और घरेलू उपकरणों ने भी शारीरिक मेहनत को घटा दिया है। इसके परिणामस्वरूप शरीर द्वारा खर्च की जाने वाली कैलोरी कम हो जाती है और सेवन बढ़ जाता है।
समस्या का दायरा और समाधान
विपरीत परिस्थितियों वाले पश्चिमी देशों के विपरीत, भारत में ऐतिहासिक रूप से मोटापे की समस्या संपन्न वर्गों में अधिक देखी गई है, हालांकि अब यह सभी आय वर्गों में फैल रही है। कुछ दशक पहले तक अधिक वजन को अच्छी सेहत की निशानी माना जाता था, क्योंकि भरपेट खाना मिलना सौभाग्य होता था। इस बढ़ती स्वास्थ्य समस्या से निपटने के लिए केवल वैश्वीकरण को दोष देने से काम नहीं चलेगा, बल्कि हमें अपने खानपान और शारीरिक गतिविधियों में सकारात्मक बदलाव लाने की आवश्यकता है।

