अशोक यूनिवर्सिटी में अंग्रेजी की प्रोफेसर और भाषाविद् रीटा कोठारी ने अपने एक आलेख में समय के साथ दु:ख को देखने के बदलते नजरिए पर विस्तार से चर्चा की है। उनका मानना है कि पुराने जमाने और आज के दौर में दु:ख को सहने और समझने के तरीके में काफी अंतर आ चुका है। आधुनिक युग में लोग हर हाल में खुश रहने का प्रयास करते हैं, जिसके चलते दु:ख में छिपी गहराई या उससे मिलने वाली सीख को कई बार आत्मकरुणा मानकर नजरअंदाज कर दिया जाता है।

सिनेमा और दु:ख का गहरा संबंध
कॉलम में पुराने दौर की फिल्मों और उनके गानों के माध्यम से जीवन के कई पहलुओं को टटोला गया है। साहित्य और संगीत में दु:ख और ट्रैजेडी का हमेशा से एक विशेष स्थान रहा है। पुराने समय में दु:ख को एक ऐसी स्थिति के रूप में देखा जाता था जो इंसान को जीवन के बारे में गहरे सबक सिखाती थी। इसके विपरीत, आधुनिकता हमें हम पर थोपे गए कष्टों के खिलाफ तुरंत आवाज उठाना और इसके लिए जिम्मेदार कारणों की तलाश करना सिखाती है।
फिल्म ‘अमर’ और नैतिक न्याय की दास्तां
आलेख में 1954 में रिलीज हुई फिल्म ‘अमर’ का विशेष जिक्र किया गया है, जो अपनी नैतिक हिम्मत और कहानी के लिए जानी जाती है। इस फिल्म के शुरुआती गाने अदालत और मंदिर को एक ही स्तर पर रखते हुए यह बताते हैं कि न्याय केवल कानूनी प्रक्रिया नहीं बल्कि एक नैतिक विषय भी है। फिल्म की कहानी न्याय के मुश्किल सफर और उसके लिए चुकानी पड़ने वाली भारी कीमत को दर्शाती है, जहां मुख्य पात्रों के जीवन में कई जटिल मोड़ आते हैं।

रिश्तों की उलझन और ‘गैर’ शब्द के मायने
फिल्मी गानों के बोलों के हवाले से रिश्तों के ताने-बाने और अपने-पराए के फर्क को भी समझाया गया है। ‘गैर’ शब्द अंग्रेजी के ‘स्ट्रेंजर’ या ‘आउटसाइडर’ से अलग अर्थ रखता है। जब कोई अपना ही व्यक्ति अचानक दूर हो जाता है या अनजान सा लगने लगता है, तो वह स्थिति दु्र्दशा और उलझन दोनों पैदा करती है। आलेख में इस बात पर जोर दिया गया है कि दु्र्दशा का भी अपना एक औचित्य होता है जिसे गरिमा के साथ सहन किया जाता है।

