भक्तों की दुनिया में हमेशा इस बात पर चर्चा होती रहती है कि ईश्वर से क्या मांगना चाहिए। एक पक्ष का मानना है कि भगवान अंतर्यामी हैं और वे सब कुछ जानते हैं, इसलिए उनसे कुछ भी मांगने की आवश्यकता नहीं है। वहीं, दूसरा पक्ष यह तर्क देता है कि ईश्वर हमारे परमपिता हैं और अपने माता-पिता से अपनी इच्छाएं कहने या मांगने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए।

इस विषय पर तुलसीदास जी का प्रसंग भी प्रासंगिक है, जिसमें काकभुशुंडि जी गरुड़ जी से कहते हैं कि वे अपने मनपसंद वरदान की मांग कर रहे हैं और साथ ही यह भी स्वीकार करते हैं कि स्वामी सबके हृदय की बात जानने वाले हैं। इस प्रसंग में एक ही बात के भीतर दोनों स्थितियां नजर आती हैं, जहां एक ओर मांगने की बात है तो दूसरी ओर ईश्वर के सर्वज्ञ होने का भाव भी है।
भौतिक सुखों के बजाय आध्यात्मिक गुणों की मांग
संतों और विचारकों का मानना है कि जब भी ईश्वर से कुछ मांगा जाए, तो कोई भी भौतिक वस्तु या सांसारिक साधन मांगने से बचना चाहिए। भौतिक चीजें तो इंसान अपनी मेहनत से पा भी सकता है और गंवा भी सकता है। इसके विपरीत, यदि ईश्वर से कुछ प्रार्थना करनी ही है, तो उनसे भक्ति में ताजगी, पूर्ण जागरूकता, चौकन्नापन और समर्पण का भाव मांगा जाना चाहिए।

दुर्गुणों से बचाव के लिए चौकन्नापन
जीवन में आने वाले दुर्गुणों और विकारों से बचने के लिए व्यक्ति को हमेशा सतर्क और सचेत रहने की जरूरत होती है। जिस प्रकार एक हिरण हर समय अपनी रक्षा के लिए चौकन्ना रहता है, उसी प्रकार भक्त को भी अपनी साधना और जीवन पथ पर सजग रहना चाहिए ताकि वह बुराइयों से दूर रह सके।

