सिलीगुड़ी कॉरिडोर भारत के मुख्य भूभाग को पूर्वोत्तर राज्यों से जोड़ने वाला एक अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील मार्ग है। इस संकरे क्षेत्र की सुरक्षा को लेकर लंबे समय से रणनीतिक चर्चाएं होती रही हैं, लेकिन आधुनिक दौर में खतरों का स्वरूप काफी बदल चुका है। पारंपरिक सैन्य आक्रमण के बजाय अब रणनीतिक स्थिरता को बाधित करने वाले अन्य तौर-तरीके अधिक चिंता का विषय बनते जा रहे हैं।

भौगोलिक संवेदनशीलता और रणनीतिक महत्व
इस कॉरिडोर का सबसे संकरा हिस्सा नेपाल और बांग्लादेश के बीच महज बीस से बाईस किलोमीटर का है, जिसके उत्तर-पूर्व में भूटान और उससे आगे सिक्किम, चुम्बी घाटी तथा डोकलाम स्थित हैं। देश के बाकी हिस्सों से पूर्वोत्तर को जोड़ने वाली सड़कें, रेलवे लाइनें, पाइपलाइन और दूरसंचार नेटवर्क इसी सीमित भौगोलिक दायरे से होकर गुजरते हैं। हालांकि इस क्षेत्र में भारतीय सेना की मजबूत तैनाती है और कठिन भूभाग के कारण किसी भी प्रत्यक्ष सैन्य आक्रमण की राह आसान नहीं है, फिर भी सुरक्षा के आयाम अब काफी विस्तृत हो गए हैं।
हाइब्रिड और गैर-सैन्य खतरों का दायरा
वर्तमान समय में सबसे बड़ी चुनौती ऐसे खतरों से जुड़ी है जो सीधे तौर पर युद्ध जैसे नहीं दिखते। किसी बड़े टकराव के दौरान परिवहन मार्गों में रुकावट, दूरसंचार सेवाओं में बाधा, ड्रोन के जरिए महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों को निशाना बनाना या साइबर हमले इसके प्रमुख उदाहरण हैं। इसके अलावा, गलत सूचनाएं फैलाकर जनमानस में चिंता पैदा करना भी शत्रुतापूर्ण ताकतों का एक साधन हो सकता है। पारंपरिक सैन्य कार्रवाई की तुलना में यह आशंका अधिक रहती है कि विरोधी ताकतें स्थानीय नेटवर्क या कमजोरियों का फायदा उठाकर व्यवधान पैदा कर सकती हैं।

सीमावर्ती इलाकों और खुफिया समन्वय की भूमिका
इस रणनीतिक क्षेत्र के आसपास के इलाकों में अवैध गतिविधियों, तस्करों के नेटवर्क और जाली दस्तावेजों के इस्तेमाल जैसी समस्याएं भी सुरक्षा पर असर डालती हैं। हथियारों और नशीले पदार्थों की तस्करी में शामिल नेटवर्क संकट के समय विध्वंसक तत्वों की मदद कर सकते हैं। यही कारण है कि स्थानीय पुलिस व्यवस्था, प्रशासनिक निगरानी और विभिन्न खुफिया एजेंसियों के बीच आपसी समन्वय बेहद आवश्यक है, ताकि पूर्वोत्तर के साथ संपर्क और देश की अखंडता सुरक्षित बनी रहे।

