वर्ष 2047 तक एक विकसित राष्ट्र बनने के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए देश को ऐसी निरंतर आर्थिक वृद्धि की आवश्यकता है जो मैन्युफैक्चरिंग और निर्यात के ठोस आधार पर टिकी हो। वर्तमान में कुल उत्पादन में विनिर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी लगभग 15 से 17 प्रतिशत के आसपास बनी हुई है। देश में हर साल 80 लाख से एक करोड़ नए गुणवत्तापूर्ण रोजगार के अवसर पैदा करने की जरूरत है, जिसे पूरा करने के लिए केवल सेवा क्षेत्र पर निर्भर नहीं रहा जा सकता।

मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र को बढ़ावा देने की आवश्यकता
आर्थिक वृद्धि, रोजगार सृजन और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में आगे रहने के लिए मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देना अनिवार्य है। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में हो रहे बदलाव के बीच भारत के पास पूंजी लागत, बिजली दरों, औद्योगिक भूमि और लॉजिस्टिक्स से जुड़ी व्यवस्थाओं में सुधार करने का यह बेहतरीन अवसर है। देश में एमएसएमई क्षेत्र को मिलने वाले ऋण की ऊंची ब्याज दरें वैश्विक बाजार में टिकने के लिए एक बड़ी चुनौती साबित होती हैं, जिन्हें कम करने के लिए औपचारिक ऋण प्रवाह का दायरा बढ़ाना जरूरी है।
बैंकिंग सुधार और ऋण उपलब्धता
कई छोटे उद्यमों को पर्याप्त जमानत या स्थिर आय के अभाव में पारंपरिक बैंकिंग प्रणाली से कर्ज प्राप्त करने में कठिनाई होती है। पंजीकृत एमएसएमई में से केवल एक सीमित हिस्सा ही औपचारिक कर्ज का लाभ उठा पाता है। इस समस्या के समाधान के लिए बैंकों को कैश-फ्लो के आधार पर ऋण देने की प्रक्रिया को प्रोत्साहित करना चाहिए तथा बैंकिंग क्षेत्र में व्यापक सुधार लाने की आवश्यकता है ताकि ऋण की लागत को युक्तिसंगत बनाया जा सके।

बिजली, भूमि और लॉजिस्टिक्स की चुनौतियां
कारखानों तक किफायती और नियमित दरों पर बिजली की आपूर्ति सुनिश्चित करना देश को एक वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने के लिए बेहद जरूरी है। इसके साथ ही, औद्योगिक भूमि की उपलब्धता और लॉजिस्टिक्स से जुड़ी बाधाओं को दूर करना भी प्राथमिकता होनी चाहिए। बंदरगाहों पर जहाजों के आवागमन और भंडारण से जुड़ी अनिश्चितताओं को समाप्त करने के लिए सीमा शुल्क व्यवस्था को अधिक पारदर्शी और प्रतिस्पर्धी बनाना होगा। भविष्य की आर्थिक नीतियों का मुख्य केंद्र टिकाऊ सुधारों को लागू करना होना चाहिए।

