विदेशों के बड़े शहरों में तकनीक का दायरा अब इतना बढ़ गया है कि सड़क पर चलने वाले फुटपाथ और स्वचालित मशीनें भी निगरानी का हिस्सा बनती जा रही हैं। तकनीकी प्रगति के साथ ही यह सवाल भी उठने लगा है कि रोजमर्रा की सहूलियत देने वाली ये छोटी मशीनें हमारी मददगार हैं या चुपचाप डेटा जुटाने का जरिया बन रही हैं।

स्वचालित फूड डिलीवरी रोबोट्स पर लग रहे हैं आरोप
शिकागो की कुक काउंटी में हाल ही में दायर मुकदमों में कोको रोबोटिक्स और सर्व रोबोटिक्स जैसी कंपनियों को निशाना बनाया गया है। इन कंपनियों के स्वचालित रोबोट्स शहरी इलाकों में फूड डिलीवरी के लिए आम तौर पर सड़कों पर घूमते नजर आते हैं। मुकदमों में यह आरोप लगाया गया है कि ये रोवर्स बिना किसी की सहमति के अपने कैमरों और सेंसरों के जरिए लोगों के चेहरे और बायोमेट्रिक्स को स्कैन करते रहते हैं। हालांकि, दोनों ही कंपनियों ने इन सभी आरोपों का कड़ाई से खंडन किया है।
कंपनियों का क्या है पक्ष?
कंपनियों का कहना है कि उनके रोबोट्स में लगे सेंसरों का उपयोग केवल जरूरी ऑपरेशनल कार्यों के लिए किया जाता है। इसके तहत रोबोट्स दूरी का आकलन करते हैं, रास्ते की बाधाओं से बचते हैं और बिना किसी इंसानी हस्तक्षेप के सुरक्षित रूप से अपने मार्ग पर चलते हैं। उनका यह भी दावा है कि उनके सिस्टम किसी भी प्रकार की स्थायी बायोमेट्रिक्स प्रोफाइल तैयार नहीं करते हैं और न ही किसी की व्यक्तिगत पहचान या निगरानी करते हैं।

सुविधा और निगरानी के बीच धुंधलाती रेखा
इस तरह के कानूनी टकराव आधुनिक समय में निजता की बहस के एक नए और गंभीर पहलू को सामने लाते हैं। जैसे-जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और स्वचालित मशीनें हमारे जीवन का हिस्सा बन रही हैं, सार्वजनिक सुविधा और व्यापक निगरानी के बीच की बारीक रेखा धीरे-धीरे धुंधली होती जा रही है। ऐसे में यह तकनीक आने वाले समय में नीति निर्धारकों और आम नागरिकों दोनों के लिए एक बड़ा विषय बनती जा रही है।

