दिल्ली सरकार ने राष्ट्रीय राजधानी में ई-रिक्शा की बढ़ती संख्या को नियंत्रित करने और यातायात व्यवस्था को सुचारू बनाने के लिए एक नया मसौदा तैयार किया है। अधिकारियों के अनुसार, इस प्रस्तावित नीति के तहत शहर में चलने वाले ई-रिक्शा की कुल संख्या को ढाई लाख तक सीमित करने का लक्ष्य रखा गया है। सरकार का मानना है कि इनकी अनियंत्रित संख्या के कारण कई इलाकों में ट्रैफिक जाम, सड़क सुरक्षा के मुद्दे और प्रदूषण जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं।

सार्वजनिक सुझाव और परिवहन में महत्व
सरकार ने इस प्रस्ताव पर आम जनता और संबंधित हितधारकों से सुझाव आमंत्रित किए हैं, और प्राप्त फीडबैक के आधार पर इस मसौदे में बदलाव भी किए जा सकते हैं। पिछले कुछ वर्षों में ई-रिक्शा दिल्ली में सार्वजनिक परिवहन का एक अहम जरिया बन चुके हैं। ये मेट्रो स्टेशनों, बाजारों, रिहायशी इलाकों और मुख्य सड़कों के बीच आने-जाने के लिए व्यापक रूप से उपयोग किए जाते हैं, जिससे लोगों को घर या बाजार पहुंचने में अंतिम मील की कनेक्टिविटी मिलती है।
नए प्रस्ताव के मुख्य बिंदु
इस नई नीति के तहत कई महत्वपूर्ण प्रावधान जोड़े गए हैं, जिनका उद्देश्य संचालन और स्वामित्व को एक व्यवस्थित ढांचे में लाना है:
- ढाई लाख की सीमा: नीति का मुख्य प्रस्ताव ई-रिक्शा की कुल संख्या को 2.5 लाख तक सीमित करना है, जिससे नए वाहनों के पंजीकरण और संचालन को विनियमित किया जा सके।
- व्यक्तिगत स्वामित्व सीमा: प्रस्ताव के अनुसार एक व्यक्ति अधिकतम पांच ई-रिक्शा का मालिक हो सकता है, ताकि इसका स्वामित्व कुछ चुनिंदा बड़े मालिकों तक सीमित न रहे।
- कम्प्लायंस सर्टिफिकेट: डिजिटल प्रणाली के तहत हर ई-रिक्शा के लिए ‘ई-रिक्शा कम्प्लायंस सर्टिफिकेट’ (ECC) का प्रस्ताव है, जिसके बिना वाहन का संचालन संभव नहीं होगा। चालकों के लिए वैध ड्राइविंग लाइसेंस होना भी अनिवार्य किया गया है।
चालकों और यात्रियों पर प्रभाव
इस नीति का असर उन चालकों की आजीविका पर पड़ सकता है जो ई-रिक्शा चलाकर अपने परिवार का भरण-पोषण करते हैं। संख्या सीमित होने से इस क्षेत्र में नए लोगों के प्रवेश पर रोक लग सकती है। हालांकि, सरकार का तर्क है कि इन नियमों और लाइसेंस अनिवार्य करने से अनधिकृत वाहनों पर कार्रवाई करना आसान होगा। वहीं, यात्रियों के लिए यातायात की भीड़भाड़ कम होने और सुचारू आवागमन की उम्मीद की जा रही है।

