इथेनॉल खरीद नीति और मक्का किसानों के भविष्य पर मंडराते सवाल

इथेनॉल खरीद नीति और मक्का किसानों के भविष्य पर मंडराते सवाल

तेल विपणन कंपनियों ने इथेनॉल सप्लाई ईयर 2026-27 के लिए भारी मात्रा में इथेनॉल खरीद के टेंडर जारी किए हैं। हालांकि, खरीद की इस नई व्यवस्था से देश की कृषि प्राथमिकताओं, खाद्य सुरक्षा और औद्योगिक विकास को लेकर कई महत्वपूर्ण सवाल उत्पन्न हो रहे हैं। इस प्रक्रिया में गन्ने के रस और शीरे जैसे पारंपरिक स्रोतों को बाहर किए जाने के कारण अब सारा दारोमदार अनाज आधारित इथेनॉल पर आ गया है।

इथेनॉल खरीद नीति और मक्का किसानों के भविष्य पर मंडराते सवाल

टूटे चावल और खराब अनाज पर बढ़ती निर्भरता

टेंडर में अलग-अलग कच्चे माल के लिए अलग कीमतें तय की गई हैं। जरूरत से ज्यादा उत्पादन क्षमता होने के कारण कंपनियों के बीच कड़ी प्रतिस्पर्धा देखने को मिल सकती है। ऐसे में कम कीमत वाली श्रेणियों का चयन बढ़ सकता है। भारतीय खाद्य निगम के पास भंडार की स्थिति को देखते हुए खराब अनाज और टूटे चावल से इथेनॉल बनाने का चलन तेजी से बढ़ सकता है। टूटे चावल से बनने वाले इथेनॉल की कीमत मक्का से बनने वाले इथेनॉल के मुकाबले कम है, जिससे इंडस्ट्री का झुकाव सस्ते विकल्पों की ओर हो सकता है।

खाद्य सुरक्षा और मक्का किसानों पर प्रभाव

अनाज की मांग बढ़ने से मानव उपभोग, पशु चारे और ईंधन सेक्टर के बीच सीधी प्रतिस्पर्धा शुरू हो सकती है, जिससे खाद्य महंगाई बढ़ने का खतरा पैदा हो सकता है। सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में किसानों को धान जैसी पानी की अधिक खपत वाली फसलों से हटाकर मक्का की खेती की तरफ प्रेरित किया था। लेकिन मक्का आधारित इथेनॉल पर मिलने वाले प्रोत्साहन और खरीद कीमतों में बदलाव के बाद किसानों के लिए अपनी लागत निकालना मुश्किल हो सकता है।

इथेनॉल खरीद नीति और मक्का किसानों के भविष्य पर मंडराते सवाल

नीतिगत विरोधाभास और आगे की राह

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मक्का किसानों को उनकी फसल का उचित दाम नहीं मिला, तो वे वैकल्पिक फसलों का रुख कर सकते हैं, जिससे फसल विविधीकरण को झटका लग सकता है। एक तरफ भूजल स्तर सुधारने के लिए धान की खेती कम करने के प्रयास हो रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ चावल आधारित इथेनॉल का बाजार बढ़ने से विरोधाभास की स्थिति बन रही है। देश के दीर्घकालिक कृषि और औद्योगिक लक्ष्यों को साधने के लिए खरीद नीतियों की प्राथमिकताओं पर नए सिरे से विचार करने की आवश्यकता है ताकि किसानों और उपभोक्ताओं दोनों के हितों की रक्षा हो सके।

Anju Kunwar

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