जेलों में जातिगत भेदभाव पर राज्यों की चुप्पी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त

जेलों में जातिगत भेदभाव पर राज्यों की चुप्पी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त

सुप्रीम कोर्ट ने देश भर की जेलों के अंदर चल रहे जातिगत भेदभाव और अमानवीय प्रथाओं के मामले में कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने उन 23 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों पर अपनी गहरी नाराजगी जताई है जिन्होंने इस संवेदनशील मुद्दे पर मांगी गई आवश्यक जानकारी साझा नहीं की है।

जेलों में जातिगत भेदभाव पर राज्यों की चुप्पी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त

न्यायमूर्ति जे.बी. पार्डीवाला और न्यायमूर्ति मनमोहन की पीठ इस स्वतः संज्ञान मामले की सुनवाई कर रही थी। पीठ ने इस स्थिति को बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और प्रशासनिक संवेदनहीनता करार दिया है। सुनवाई के दौरान न्याय मित्र और वरिष्ठ अधिवक्ता एस. मुरलीधर द्वारा दिए गए सुझावों पर भी विचार किया गया, जिसमें जिला-स्तरीय ‘बोर्ड आफ विजिटर्स’ के गठन जैसे आवश्यक कदमों पर राज्यों द्वारा रिपोर्ट न सौंपने की बात सामने आई थी।

मुख्य सचिवों को व्यक्तिगत पेशी की चेतावनी

शीर्ष अदालत ने सहयोग न करने वाले सभी संबंधित राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को अपना जवाब दाखिल करने के लिए आखिरी मौका दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि आगामी 13 जनवरी को होने वाली अगली सुनवाई तक जवाब नहीं सौंपा जाता है, तो संबंधित राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों या प्रधान सचिवों को अदालत में व्यक्तिगत रूप से हाजिर होने का निर्देश दिया जा सकता है।

अक्टूबर 2024 का ऐतिहासिक फैसला

उल्लेखनीय है कि इससे पहले अक्टूबर 2024 में दिए गए एक महत्वपूर्ण फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने जेल मैनुअल के उन तमाम नियमों को असंवैधानिक करार दिया था, जो कैदियों के बीच जाति के आधार पर काम का बंटवारा करते थे या किसी भी तरह के भेदभाव को बढ़ावा देते थे। अदालत की इस सख्ती से अब जेल प्रशासन में सुधार लाने की दिशा में राज्यों पर जवाबदेही तय होने की उम्मीद है।

Anju Kunwar

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