ईरान की एक अदालत ने विश्वविख्यात फिल्मकार जफर पनाही को पांच साल की सजा सुनाते हुए उनकी संपत्ति जब्त करने के निर्देश दिए हैं। इस फैसले के बाद एक बार फिर कला, सिनेमा और सत्ता के बीच के संवेदनशील रिश्तों पर बहस छिड़ गई है, क्योंकि हुकूमतें अक्सर उन सच्चाइयों को सुनना पसंद नहीं करतीं जिन्हें सिनेमा उजागर करता है।

कला और सत्ता का अंतर्द्वंद्व
जफर पनाही को पहले भी कई बार गिरफ्तार किया जा चुका है और वे जेल में अनशन भी कर चुके हैं। अब्बास काइरोस्तॉमी के सहायक रहे पनाही ने ‘वाइट बैलून’ जैसी बेहतरीन फिल्मों से अपने निर्देशन करियर की शुरुआत की थी। उनकी फिल्में बेहद साधारण कहानियों के जरिए ईरानी समाज के कई पहलुओं और वास्तविकताओं पर चुपचाप गहरी टिप्पणी कर जाती हैं।
राष्ट्र और सरकार का फर्क
एक तरफ ईरान का मुकाबला बाहरी ताकतों के साथ चल रहा है, वहीं दूसरी तरफ देश के भीतर असहमति और आलोचना की आवाजों को दबाने का सिलसिला भी जारी है। जानकारों का मानना है कि जब जफर पनाही अपनी फिल्मों के जरिए सरकार की नीतियों पर सवाल उठाते हैं, तो वे अपनी हुकूमत के खिलाफ हो सकते हैं, लेकिन वे अपने देश और समाज की वास्तविक चेतना के साथ खड़े होते हैं। सरकारें अक्सर खुद को देश का पर्याय मान लेती हैं और सरकार के खिलाफ उठने वाले हर संघर्ष को राष्ट्रद्रोह के रूप में पेश करने की कोशिश करती हैं।

ईरानी सिनेमा का साहसिक सफर
वर्ष 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद के कट्टरपंथ के बीच भी ईरानी सिनेमा ने अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई है और लगातार साहसिक प्रतिरोध दर्ज किया है। ईरानी फिल्मकारों ने हमेशा अपनी अवाम का साथ देते हुए सच का सामना करने का जोखिम उठाया है। यह सिनेमा केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज के भीतर की सच्चाइयों को आईना दिखाने का एक सशक्त माध्यम बना हुआ है।

