साहित्यिक मूल्यांकन और पश्चिमी देशों का नजरिया: क्या नोबेल पुरस्कार वास्तव में वैश्विक हैं?

साहित्यिक मूल्यांकन और पश्चिमी देशों का नजरिया: क्या नोबेल पुरस्कार वास्तव में वैश्विक हैं?

साहित्य के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठित माने जाने वाले नोबेल पुरस्कारों की चयन प्रक्रिया और उनके यूरोप-केंद्रित दृष्टिकोण पर समय-समय पर गंभीर सवाल उठाए जाते रहे हैं। हाल ही में इस बात पर बहस छिड़ी है कि क्या दुनिया भर के साहित्य का मूल्यांकन करने के लिए केवल पश्चिमी मानदंडों का ही उपयोग किया जाना चाहिए। इस वर्ष इस पुरस्कार के लिए भारत के प्रसिद्ध लेखक गुलजार का नाम भी चर्चा में था, लेकिन चयनकर्ताओं ने कनाडाई लेखिका ऐन कार्सन को चुना।

साहित्यिक मूल्यांकन और पश्चिमी देशों का नजरिया: क्या नोबेल पुरस्कार वास्तव में वैश्विक हैं?

एक सदी से अधिक समय से भारतीय साहित्य की उपेक्षा

इतिहास गवाह है कि साहित्य का नोबेल पुरस्कार पाने वाले एकमात्र भारतीय रबींद्रनाथ ठाकुर थे, जिन्हें यह सम्मान वर्ष 1913 में मिला था। इसके बाद से एक सदी से अधिक का समय बीत चुका है और दुनिया के सबसे अधिक आबादी वाले उपमहाद्वीप में, जहां दर्जनों विकसित साहित्यिक भाषाएं और प्राचीन लिखित परंपराएं मौजूद हैं, किसी भी अन्य लेखक को इस योग्य नहीं समझा गया। आलोचकों का मानना है कि स्वीडन की चयन समिति ने पश्चिमी भाषाओं के दायरे से बाहर जाकर अन्य साहित्यिक प्रतिभाओं की खोज करने में रुचि नहीं दिखाई।

सांख्यिकीय आंकड़े क्या कहते हैं?

आंकड़ों पर गौर करें तो पता चलता है कि 1901 में इन पुरस्कारों की शुरुआत के बाद से अधिकांश विजेता पश्चिमी देशों से ही ताल्लुक रखते हैं। अकेले फ्रांस, अमेरिका और ब्रिटेन के पास विजेताओं का एक बड़ा हिस्सा है। यदि भाषा के आधार पर देखें, तो अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मन और स्पैनिश जैसी कुछ चुनिंदा पश्चिमी भाषाओं को कुल पुरस्कारों का लगभग दो-तिहाई हिस्सा मिल चुका है। इसके विपरीत, एशिया, अफ्रीका और मध्य-पूर्व की समृद्ध और प्राचीन सभ्यताओं का प्रतिनिधित्व बहुत सीमित रहा है।

साहित्यिक मूल्यांकन और पश्चिमी देशों का नजरिया: क्या नोबेल पुरस्कार वास्तव में वैश्विक हैं?

चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी

इन पुरस्कारों की चयन प्रक्रिया की गोपनीयता और पारदर्शिता के अभाव पर भी सवाल उठते रहे हैं। फैसले ऐसे माहौल में लिए जाते हैं जो सार्वजनिक समीक्षा के दायरे से बाहर होते हैं, जिससे इसमें भू-राजनीतिक प्रभावों की गुंजाइश बनी रहती है। शांति के नोबेल पुरस्कार के संदर्भ में भी ऐसे कई उदाहरण दिए जाते हैं जहां महात्मा गांधी जैसे दिग्गजों को बार-बार नामांकित किए जाने के बावजूद यह सम्मान नहीं मिला। विशेषज्ञों का सुझाव है कि हमें अपने साहित्यिक और सांस्कृतिक मूल्यांकन के पैमानों को पश्चिमी प्रभावों से मुक्त करने की आवश्यकता है।

Anju Kunwar

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