उत्तराखंड के सीमांत विकासखंड मोरी के अंतर्गत आने वाले दूरस्थ लिवाड़ी गांव में बुनियादी सुविधाओं का अभाव एक बार फिर खुलकर सामने आया है। स्वास्थ्य खराब होने पर एक 21 वर्षीय युवक को परिजनों और ग्रामीणों की मदद से डंडी-कंडी के सहारे करीब 12 किलोमीटर का सफर तय कर जखोल तक पहुंचाना पड़ा, जिसके बाद उसे आगे वाहन सुविधा मिल सकी। क्षेत्र में सड़क न होने के कारण आपातकालीन स्थितियों में लोगों को इस प्रकार की कठिन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

तेरह साल से अधूरी है सड़क योजना
ग्रामीणों के अनुसार, लिवाड़ी गांव को मोटर मार्ग से जोड़ने की स्वीकृति वर्ष 2013 में दी गई थी। हालांकि, लंबा समय बीत जाने के बाद भी इस सड़क का निर्माण कार्य अधूरा पड़ा है और इसका कुछ हिस्सा अभी भी तैयार होना बाकी है। निर्माण कार्य की धीमी गति के कारण स्थानीय लोग आज भी आवागमन के लिए पुराने पैदल रास्तों पर निर्भर हैं, जो कई जगहों पर क्षतिग्रस्त होने के साथ झाड़ियों से ढंके हुए हैं।
छह साल से लंबित है पुल का निर्माण
सड़क के अलावा इस क्षेत्र में पुल का न होना भी एक बड़ी परेशानी बना हुआ है। रालासों से लिवाड़ी की तरफ बनने वाला प्रस्तावित पुल लगभग छह वर्षों से लटका हुआ है। पुल के अभाव में ग्रामीणों को गदेरा पार करने के लिए लकड़ी के फट्टों का सहारा लेना पड़ता है, जो बरसात के दिनों में बहुत खतरनाक साबित होता है। पहले यहां आवाजाही के लिए ट्रॉली की व्यवस्था की गई थी, लेकिन वर्तमान में वह भी उपलब्ध नहीं है।

प्रशासन से त्वरित कार्रवाई की मांग
स्थानीय निवासियों का कहना है कि वे इस समस्या को लेकर कई बार धरने पर बैठने के साथ चुनाव का बहिष्कार भी कर चुके हैं और अधिकारी भी क्षेत्र का निरीक्षण कर चुके हैं। इसके बावजूद स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है। ग्रामीणों ने शासन और प्रशासन से मांग की है कि सड़क के शेष बचे हिस्से का निर्माण कार्य जल्द पूरा किया जाए, लंबित पुल का काम शुरू किया जाए और तब तक आपात स्थिति के लिए उचित वैकल्पिक प्रबंध किए जाएं।

