महिलाएं आज जीवन के हर क्षेत्र में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रही हैं और खुद को साबित कर रही हैं। इसके बावजूद, समाज की रूढ़िवादी सोच और अपराध उनकी राह में लगातार बाधाएं पैदा कर रहे हैं। हाल ही में देश के विभिन्न हिस्सों से सामने आए महिलाओं और किशोरियों के खिलाफ अपराधों के मामले अत्यंत विचलित करने वाले हैं।

कविता के आईने में महिला का वजूद और संघर्ष
एक सुंदर कविता के माध्यम से स्त्री के दैनिक जीवन और उसकी सहनशक्ति को बहुत गहराई से दर्शाया गया है। जिस प्रकार पृथ्वी सब कुछ सहन करती है और सूरज के सामने लोई की तरह है, वैसे ही एक महिला चुपचाप अपनी जिम्मेदारियां निभाती है। वह देर रात तक काम करने के बाद भी अपने वजूद की आंच में खुद को ढालती है। महिलाएं अपनी हरियाली को खुद अपने बलबूते सींच रही हैं और वे निडर होकर आगे बढ़ना चाहती हैं।
अपराधों पर समाज की चुप्पी और संवेदनहीनता
महिलाओं के खिलाफ हो रहे अपराध केवल कानूनी विफलता नहीं हैं, बल्कि यह सामाजिक संवेदनाओं के पतन को भी दर्शाते हैं। दिल्ली और जमुई जैसी जगहों पर हुई घटनाएं यह सवाल खड़ा करती हैं कि आखिर इस तरह की निर्दयता और वैमनस्यता कहां से आती है। कुछ आपराधिक तत्व कानून के डर के बिना इस तरह के कुकृत्य को अंजाम दे रहे हैं, जबकि एक बड़ा समाज ऐसी घटनाओं पर चुप्पी साध लेता है।

नैतिक शिक्षा और सामाजिक बदलाव की जरूरत
केवल सरकारों और कानूनों के भरोसे रहकर समाज में बदलाव नहीं लाया जा सकता। हर गली और नुक्कड़ पर पुलिस या सरकार मौजूद नहीं हो सकती। ऐसे में यह जरूरी है कि हमारा समाज अपनी चुप्पी तोड़े और बच्चों को शुरुआत से ही महिलाओं के सम्मान और सही मार्ग की शिक्षा दे। जब तक समाज अंदर से जागरूक नहीं होगा और इस तरह के अत्याचारों के खिलाफ मुखर नहीं होगा, तब तक महिलाओं के लिए सुरक्षित माहौल बनाना मुश्किल रहेगा।

