दिल्ली के चित्तरंजन पार्क (CR Park) में दुर्गा पूजा के पावन अवसर पर एक बेहद आकर्षक स्टॉल आगंतुकों का ध्यान आकर्षित कर रहा है। पश्चिम बंगाल के लोक कलाकार बापी चित्रकार द्वारा सजाए गए इस स्टॉल पर मिट्टी के बर्तनों, केतली, ट्रे और कपड़ों पर उकेरी गई पारंपरिक पटचित्र कला देखने को मिलती है। हर कलाकृति के साथ एक अनूठी कहानी और उससे जुड़ा पारंपरिक लोकगीत जुड़ा हुआ है, जो इस स्थान को किसी जीवंत मंच में बदल देता है।

परंपरा और इतिहास से जुड़ी पटचित्र कला
दौर ऐसा था जब टेलीविजन या सिनेमा का अस्तित्व नहीं था, तब बंगाल के लोक कलाकार गांवों में घूम-घूमकर चित्रित स्क्रॉल दिखाते थे और चित्रों से जुड़ी कहानियां गाते थे। इसके बदले में उन्हें ग्रामीणों से चावल या कुछ सिक्के मिलते थे। आज समय बदल चुका है और यह प्राचीन कला देश की राजधानी दिल्ली तक पहुंच गई है। बापी चित्रकार का यह स्टॉल इस कला को जीवंत रखने का एक अनूठा प्रयास है।
रंगों की अनूठी दुनिया और आधुनिक प्रयोग
इस पारंपरिक कला में इस्तेमाल होने वाले रंग मुख्य रूप से प्राकृतिक स्रोतों जैसे सब्जियों, फलों और यहां तक कि वाहनों के धुएं से तैयार किए जाते हैं। हालांकि, समय के साथ कलाकारों ने नए माध्यमों को भी अपनाया है। अब लकड़ी की ट्रे, दुपट्टे और थैलों पर एक्रेलिक रंगों का उपयोग किया जाता है। स्टॉल पर मछली के विवाह की कहानी से लेकर बिल्ली, उल्लू और दुर्गा मां के स्वरूपों को बेहद खूबसूरती से उकेरा गया है। यहां तक कि महामारी के दौरान कोरोना वायरस और उससे जुड़े गीत भी इस कला का हिस्सा बने हैं।

नई पीढ़ी को सौंप रहे हैं विरासत की कमान
पारंपरिक कलाकारों के लिए कला को जीवित रखना ही उनका मुख्य उद्देश्य है। बापी चित्रकार अपने परिवार के साथ-साथ अपने गांव के बच्चों को भी हर रविवार इस कला का प्रशिक्षण देते हैं, ताकि यह प्राचीन लोक कला आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुंच सके। मौसम और मेलों के आधार पर अपनी आजीविका चलाने वाले ये कलाकार आज अपनी कला को देश ही नहीं बल्कि लंदन, वाशिंगटन और कैलिफोर्निया तक पहुंचा चुके हैं।

