देशभर में इन दिनों डिजिटल अरेस्ट के माध्यम से होने वाली ठगी के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं, जिस पर हाल ही में अदालतों ने भी गंभीर चिंता व्यक्त की है। इस आधुनिक साइबर फ्रॉड में ठग खुद को पुलिस या अन्य बड़ी जांच एजेंसियों के अधिकारी बताकर लोगों को निशाना बनाते हैं और उनके मन में कानूनी कार्रवाई का गहरा खौफ पैदा कर देते हैं।

क्या होती है डिजिटल अरेस्ट की ठगी?
इस धोखेबाजी के तरीके में ठग फोन या वीडियो कॉल के जरिए पीड़ितों से संपर्क करते हैं और उन्हें डराते हैं कि उनका आधार कार्ड या बैंक खाता मनी लॉन्ड्रिंग और ड्रग तस्करी जैसे गंभीर मामलों में शामिल पाया गया है। अपनी बात को सही साबित करने के लिए वे व्हाट्सएप या ईमेल के माध्यम से फर्जी गिरफ्तारी वारंट और नकली अदालती आदेश भेजते हैं। इसके बाद पीड़ित को यह विश्वास दिलाया जाता है कि वह लगातार डिजिटल निगरानी में है।
डर के प्रभाव में आकर लोग कई घंटों या दिनों तक वीडियो कॉल पर बने रहते हैं और अपने परिजनों से संपर्क नहीं कर पाते हैं। अंत में मामलों को रफा-दफा करने या सुरक्षा जांच के नाम पर उनके बैंक खातों से पैसे ट्रांसफर करवा लिए जाते हैं। भारतीय कानून प्रणाली में डिजिटल अरेस्ट जैसी किसी भी व्यवस्था का कोई प्रावधान नहीं है और न ही कोई कानून प्रवर्तन एजेंसी वीडियो कॉल पर गिरफ्तारी करती है या पैसे मांगती है।
बढ़ते आंकड़े और कानूनी स्थिति
राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल (NCRP) के आंकड़ों के अनुसार, इस प्रकार के साइबर अपराधों में लगातार उछाल आया है। वर्ष 2022 में जहां 39,925 शिकायतें दर्ज हुईं और 91.14 करोड़ रुपये की ठगी हुई, वहीं वर्ष 2024 में यह आंकड़ा बढ़कर 1,23,672 शिकायतों और 1,935.51 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। सुप्रीम कोर्ट ने भी ऐसे मामलों पर स्वतः संज्ञान लिया है, जहां बुजुर्ग दंपतियों को नकली दस्तावेजों के जरिए ठगा गया।
मनोविज्ञान का खेल और सरकारी कदम
विशेषज्ञों के अनुसार, यह फ्रॉड केवल तकनीक का नहीं बल्कि मानव मनोविज्ञान का खेल है। ठग लोगों के मन में जेल जाने का ऐसा डर पैदा कर देते हैं कि उनकी सोचने-समझने की क्षमता प्रभावित हो जाती है। इस बढ़ती चुनौती से निपटने के लिए सरकार और गृह मंत्रालय के तहत भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) द्वारा समन्वित प्रयास किए जा रहे हैं ताकि देश में साइबर धोखाधड़ी को रोका जा सके।

