बच्चों की परवरिश में माता-पिता अक्सर उन्हें बेहतर अंक लाने, प्रतियोगिता जीतने और हर क्षेत्र में सफलता हासिल करने के लिए प्रेरित करने में जुटे रहते हैं। लेकिन क्या हम उन्हें जीवन की वास्तविक सच्चाइयों और असफलताओं का सामना करने के लिए तैयार करते हैं? जिंदगी हमेशा हमारी उम्मीदों के अनुसार हां नहीं कहती, इसलिए बच्चों को आत्मविश्वास खोए बिना ‘ना’ सुनना सिखाना बेहद जरूरी है।

अस्वीकार (रिजेक्शन) को स्वीकार करने की कला
अक्सर मुंबई जैसे बड़े शहरों में व्यस्त ट्रैफिक सिग्नलों पर छोटे बच्चों को सामान या फूल बेचते देखा जा सकता है। गाड़ियां रुकने पर वे हर वाहन की खिड़की पर जाकर लोगों से चीजें खरीदने का अनुरोध करते हैं। कई बार लोग उन्हें नजरअंदाज कर देते हैं या सीधे मना कर देते हैं। तमाम निराशाओं और अस्वीकृति का सामना करने के बावजूद वे निराश होकर बैठ नहीं जाते, बल्कि अगली गाड़ी की तरफ बढ़कर दोबारा प्रयास करने की हिम्मत जुटाते हैं।
कक्षा से बाहर का एक महत्वपूर्ण सबक
यह दृश्य बच्चों को कक्षाओं में पढ़ाए जाने वाले सिद्धांतों से कहीं अधिक बड़ा व्यावहारिक सबक दे सकता है। इससे यह सीखा जा सकता है कि किसी एक मोर्चे पर ना मिल जाना या असफलता हाथ लगना जीवन का अंत नहीं होता। बच्चों को यह समझाना आवश्यक है कि एक बार का इनकार किसी व्यक्ति की योग्यता या महत्व को कम नहीं करता है।

असफलताओं से सीखकर आगे बढ़ना
जब भी बच्चों को किसी परीक्षा में कम अंक मिलें, किसी प्रतियोगिता में असफलता का सामना करना पड़े या कोई अवसर हाथ से निकल जाए, तो उन्हें निराश होने के बजाय नए सिरे से प्रयास करने का जज्बा रखना चाहिए। उन्हें यह बताना जरूरी है कि रुकावटें सफर का अंत नहीं होतीं, बल्कि आगे बढ़ने के लिए नए रास्तों की तलाश करने का अवसर होती हैं।

