छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में यह स्पष्ट किया है कि सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ किसी भी प्रकार की अनुशासनात्मक कार्रवाई या मामूली दंड लगाने से पहले उन्हें आरोपों पर अपनी प्रतिक्रिया देने का पूरा मौका मिलना चाहिए। अदालत का कहना है कि सजा चाहे छोटी ही क्यों न हो, लेकिन निर्धारित कानूनी प्रक्रिया और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों की अनदेखी नहीं की जा सकती है।

सजा के आदेश को किया गया रद्द
न्यायालय ने एक सरकारी कर्मचारी की एक वार्षिक वेतन वृद्धि बिना संचयी प्रभाव के रोकने के आदेश को पूरी तरह से खारिज कर दिया। अदालत ने पाया कि कर्मचारी को दंडित किए जाने से पहले अपनी सफाई पेश करने का अनिवार्य अवसर प्रदान नहीं किया गया था। यह पूरा मामला ग्रामीण इंजीनियरिंग सेवाओं में तैनात एक सहायक ड्राफ्टमैन से जुड़ा हुआ है।
समीक्षा बैठक के दौरान उठा था मामला
रिकॉर्ड के अनुसार, निर्माण कार्यों की प्रगति की समीक्षा के लिए एक बैठक आयोजित की गई थी, जिसमें दी गई जानकारी गलत पाई गई थी। इसके बाद उस कर्मचारी के खिलाफ कार्रवाई शुरू की गई। समीक्षा बैठक 10 जून 2026 को हुई थी और उसके ठीक अगले दिन यानी 11 जून को दंड का आदेश भी जारी कर दिया गया। कर्मचारी का पक्ष था कि उसे न तो कोई लिखित नोटिस दिया गया और न ही आरोप पर जवाब देने का मौका मिला।
नियमों का पालन है जरूरी
सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय ने छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण और अपील) नियम, 1966 के नियम 16(1)(ए) का उल्लेख किया। अदालत ने बताया कि मामूली जुर्माना या सजा देने से पहले कर्मचारी को प्रस्तावित कार्रवाई और दुर्व्यवहार के आरोपों की लिखित सूचना देना अनिवार्य है। अदालत ने माना कि यह प्रक्रिया केवल एक औपचारिकता नहीं बल्कि निष्पक्षता की एक बुनियादी जरूरत है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि सजा सुनाए जाने के बाद दिया गया स्पष्टीकरण कानूनी रूप से मान्य नहीं माना जा सकता, क्योंकि नियम के मुताबिक अवसर सजा से पहले दिया जाना चाहिए ताकि प्राधिकारी उस पर विचार कर सकें। इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए उच्च न्यायालय ने 11 जून 2026 के उस पेनल्टी आदेश को कानूनी रूप से टिकने योग्य न मानते हुए रद्द कर दिया।

