सुप्रीम कोर्ट में राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम को कानूनी सुरक्षा देने के खिलाफ दायर एक याचिका पर सुनवाई के दौरान मंगलवार को तीखी बहस देखने को मिली। अदालत में सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल द्वारा इस्तेमाल किए गए एक शब्द पर वरिष्ठ वकीलों ने कड़ी आपत्ति जताई, जिसके बाद मामले में न्यायालय को हस्तक्षेप करना पड़ा।

वकीलों और सॉलिसिटर जनरल के बीच बहस
याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी कर रहे वरिष्ठ वकील और पूर्व जज एस. मुरलीधर ने तर्क दिया कि इस तरह के मामलों में कानून बनाने की प्रक्रिया व्यापक सार्वजनिक चर्चा और जनमत के आधार पर होनी चाहिए। इस पर हस्तक्षेप करते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि कानून का निर्माण संविधान के अनुसार होता है और यह किसी खास विचारधारा के हिसाब से नहीं बन सकता। सॉलिसिटर जनरल की इस टिप्पणी पर मुरलीधर ने कड़ा ऐतराज जताते हुए इसे तुरंत वापस लेने की मांग की। हालांकि, सॉलिसिटर जनरल ने स्पष्ट किया कि उन्होंने किसी व्यक्ति विशेष के लिए नहीं बल्कि एक विशेष विचारधारा को लेकर बात कही है और वह अपने बयान पर कायम हैं।
अदालत का हस्तक्षेप और निर्देश
मामले में बढ़ती गरमागरम बहस को देखते हुए चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने बीच-बचाव किया। पीठ ने स्पष्ट किया कि अदालत केवल संविधान की व्याख्या से जुड़े कानूनी पहलुओं पर ही विचार कर रही है। सुनवाई के दौरान अदालत ने 1986 के उस फैसले का भी जिक्र किया जिसमें राष्ट्रगान न गाने को लेकर कानूनी कार्रवाई से राहत दी गई थी।
केंद्र सरकार से मांगा गया जवाब
अदालत ने इस मामले में केंद्र सरकार से औपचारिक रूप से जवाब तलब किया है। इसके साथ ही पीठ ने दोनों पक्षों को निर्देश दिया है कि वे अगली सुनवाई तक अपने सभी संवैधानिक तर्क तैयार रखें। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि कानूनी प्रक्रिया और अधिकारों के दायरे में ही मामले की अगली सुनवाई की जाएगी।

