राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) के 33वें स्थापना दिवस समारोह के अवसर पर प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने आयोग की सराहना करते हुए इसे पीड़ितों के लिए एक भरोसेमंद ठिकाना करार दिया। उन्होंने कहा कि आयोग की असली कसौटी केवल निपटाए गए मामलों की संख्या नहीं है, बल्कि यह देखना भी है कि वहां उन लोगों की आवाज सुनी जाती है या नहीं जो अपनी बात कहने में सबसे कम सक्षम हैं।

संविधान के रखवालों में से एक है आयोग
समारोह को संबोधित करते हुए जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि यदि संविधान एक वादा है, तो राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग उसके प्रमुख रखवालों में से एक है। इसकी पहुंच उन स्थानों तक आसानी से हो जाती है जहां अदालतें नहीं पहुंच पातीं। यह उन लोगों की बात सुनता है जो आसानी से बोल नहीं सकते और किसी के निर्देश का इंतजार किए बिना खुद कार्रवाई करने की क्षमता रखता है। उन्होंने हिरासत में यातना, बंधुआ मजदूरी, सिलिकोसिस के खतरे और हाशिये के समुदायों के अधिकारों से जुड़े मामलों में एनएचआरसी के हस्तक्षेप का विशेष रूप से उल्लेख किया।
स्वच्छ पानी और पर्यावरण अधिकारों पर जोर
प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि गरिमा के साथ जीवन जीने की गारंटी के तहत स्वास्थ्य, भोजन, आश्रय, आजीविका और स्वच्छ पर्यावरण जैसे अधिकार मानवीय गरिमा के लिए आवश्यक हो गए हैं। जीवन के अधिकार में अब प्रदूषण-मुक्त हवा और पानी का अधिकार भी शामिल है। उन्होंने सुरक्षित पेयजल की उपलब्धता पर बात करते हुए कहा कि आर्सेनिक, फ्लोराइड या अन्य हानिकारक तत्वों से दूषित पानी जीवन और स्वास्थ्य के लिए एक बड़ा खतरा है। घटता हुआ भूजल और प्रदूषित नदियां आने वाली पीढ़ियों पर एक भारी बोझ बन रही हैं।
सीजेआई का कार्यालय सबसे सक्रिय और जोखिम वाला
कार्यक्रम के दौरान एनएचआरसी के अध्यक्ष जस्टिस (सेवानिवृत्त) वी. रामासुब्रमण्यम ने भी अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि प्रधान न्यायाधीश का कार्यालय देश का सबसे महत्वपूर्ण, शक्तिशाली और सक्रिय कार्यालय होने के साथ-साथ सबसे अधिक जोखिम वाला भी है, जहां हर मिनट एक नई चुनौती का सामना करना पड़ता है। जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों का जिक्र करते हुए उन्होंने चेतावनी दी कि यदि वर्तमान मार्ग पर ही चलते रहे, तो अत्यधिक गर्मी के कारण पृथ्वी के कुछ हिस्से रहने योग्य नहीं बचेंगे।

