दिल्ली उच्च न्यायालय ने बुधवार को एक आतंकवाद फंडिंग मामले में सुनवाई के दौरान अलगाववादी नेता यासीन मलिक के जेल से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश न होने पर कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने इस संबंध में संबंधित जेल अधीक्षक से रिपोर्ट मांगी है। जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (JKLF) का प्रमुख यासीन मलिक वर्तमान में तिहाड़ जेल में बंद है और एक मामले में उम्रकैद की सजा काट रहा है।

न्यायालय की पीठ ने स्पष्ट किया कि प्रतिवादी को वर्चुअल माध्यम से पेश किया जाना था, लेकिन ऐसा नहीं किया गया। इसके बाद अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 9 दिसंबर के लिए तय की और निर्देश दिया कि उस दिन मलिक को अनिवार्य रूप से कार्यवाही में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए जोड़ा जाए।
राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण की अपील
अदालत उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसमें राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (NIA) ने यासीन मलिक को दी गई उम्रकैद की सजा को बढ़ाकर मृत्युदंड में बदलने की मांग की है। पूर्व में निचली अदालत ने यूएपीए और भारतीय दंड संहिता के तहत अपराधों के लिए मलिक को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। हालांकि, एनआईए का तर्क है कि आतंकवादियों को केवल इसलिए आजीवन कारावास तक सीमित नहीं रखा जा सकता क्योंकि उन्होंने अपना जुर्म स्वीकार कर लिया है और मुकदमे का सामना नहीं किया है।
सुरक्षा कारणों से वर्चुअल पेशी की अनुमति
इससे पहले जेल अधिकारियों ने मलिक को एक अत्यधिक जोखिम वाला कैदी बताते हुए अदालत में उसकी भौतिक पेशी से छूट मांगी थी, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया था। इस बीच, मामले से जुड़े विभिन्न पक्षों और कानूनी दलीलों पर उच्च न्यायालय में आगे की कार्यवाही जारी है।

