भारत में मृत्युदंड किसी भी दोषी व्यक्ति को दी जाने वाली सबसे कड़ी सजा है, जिसे केवल ‘दुर्लभतम से दुर्लभ’ श्रेणी के अपराधों में ही लागू किया जाता है। हाल ही में मेरठ के एक चर्चित हत्याकांड में अदालत द्वारा दो दोषियों को मौत की सजा सुनाए जाने के बाद यह विषय एक बार फिर चर्चा में आ गया है। न्यायपालिका द्वारा इस तरह के कठोर निर्णय यह सुनिश्चित करने के लिए लिए जाते हैं कि जघन्य अपराधों के लिए उचित न्याय मिल सके।

मृत्युदंड और कानूनी प्रावधान
भारतीय न्याय प्रणाली में सुधारवादी दृष्टिकोण को अपनाया जाता है, जिसके तहत किसी भी आरोपी को दोष साबित होने तक निर्दोष माना जाता है। हालांकि, जब अपराध अत्यंत गंभीर प्रकृति का होता है और अन्य सजाएं कम प्रतीत होती हैं, तब अदालतें मृत्युदंड का विकल्प चुनती हैं। भारतीय कानूनों के अनुसार, फांसी की सजा का मतलब दोषी व्यक्ति को गर्दन में फंदा डालकर तब तक लटकाए रखना है जब तक उसकी मृत्यु न हो जाए।
आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 354(3) के अंतर्गत अदालतों को यह स्पष्ट करना अनिवार्य होता है कि किसी मामले में उम्रकैद के बजाय मौत की सजा क्यों दी जा रही है, और इसके लिए विशेष कारण दर्ज करने होते हैं।

भारतीय न्याय संहिता और नए प्रावधान
समय के साथ आपराधिक कानूनों में बदलाव किए गए हैं। भारतीय न्याय संहिता (BNS) के अंतर्गत कई गंभीर अपराधों के लिए मृत्युदंड के प्रावधानों को स्पष्ट किया गया है:
- बलात्कार के मामले: बलात्कार की ऐसी घटनाएं जिनमें पीड़िता की मृत्यु हो जाती है या वह लगातार वानस्पतिक अवस्था में चली जाती है, वहां मृत्युदंड का प्रावधान है।
- सामूहिक और बार-बार अपराध: सामूहिक बलात्कार और एक से अधिक बार इस तरह के अपराध के दोषी पाए जाने पर मौत की सजा मिल सकती है।
- हत्या और अपहरण: हत्या के मामले, फिरौती के लिए अपहरण, और आतंकवादी कृत्यों के परिणामस्वरूप होने वाली मौतों के लिए भी यह सजा दी जा सकती है।
- अन्य गंभीर अपराध: भारत सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ना, झूठे साक्ष्य गढ़ना जिससे किसी निर्दोष की मौत हो जाए, और डकैती के दौरान हत्या करना शामिल है।
संवैधानिक वैधता
भारत में मृत्युदंड की संवैधानिकता को समय-समय पर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। अदालतों ने अपने फैसलों में यह स्पष्ट किया है कि मौत की सजा कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के तहत दी जाती है और यह संविधान के विभिन्न अनुच्छेदों का उल्लंघन नहीं करती है। न्यायाधीश मुकदमे के दौरान सामने आए तथ्यों, परिस्थितियों और अपराध की गंभीरता के आधार पर उम्रकैद और मृत्युदंड के बीच निर्णय लेते हैं। अतीत में कई चर्चित मामलों के दोषियों को कानून के तहत फांसी दी जा चुकी है।

